नसबंदी के बाद भी 64 महिलाएं हुईं प्रेगनेंट, शहर में मचा हड़कंप


- नसबंदी के बाद 64 महिलाएं हुईं गर्भवती; स्वास्थ्य विभाग में मचा हड़कंप, मुआवजे की प्रक्रिया शुरू
अलीगढ़, 8 जनवरी । उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर सवालिया निशान खड़ा करने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। वर्ष 2025 में परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत नसबंदी कराने के बावजूद जिले की 64 महिलाएं दोबारा गर्भवती हो गई हैं। इस घटना के उजागर होने के बाद जहां प्रभावित परिवारों में आक्रोश है, वहीं स्थानीय स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। विभाग अब अपनी साख बचाने और पीड़ितों को मुआवजा देने की कवायद में जुट गया है।


मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, नसबंदी फेल होने की शिकायतों के बाद मुआवजे की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। वर्तमान में 62 मामलों के लिए क्षतिपूर्ति राशि विभाग के पास पहुंच चुकी है, जिसे जल्द ही वितरित किया जाएगा। हालांकि, विभाग ने स्पष्ट किया है कि मुआवजा उन्हीं मामलों में देय होगा जहां नियमों का पालन किया गया है। सरकारी दिशा-निर्देशों के तहत, नसबंदी के बाद यदि गर्भधारण होता है, तो इसकी सूचना 90 दिनों के भीतर स्वास्थ्य विभाग को देना अनिवार्य है। इसी नियम की अनदेखी के चलते 8 महिलाओं के दावों को निरस्त कर दिया गया है, जिनमें लोधा, छर्रा, अकराबाद और जवां जैसे ब्लॉक शामिल हैं।


सरकारी प्रावधानों के मुताबिक, नसबंदी विफल होने पर प्रभावित महिला को कुल 60 हजार रुपये की सहायता राशि दी जाती है। इसमें 30 हजार रुपये केंद्र सरकार और 30 हजार रुपये राज्य सरकार द्वारा वहन किए जाते हैं। विभाग का तर्क है कि देरी से आवेदन करने वालों को इस लाभ से वंचित रहना पड़ेगा। आंकड़ों पर गौर करें तो अलीगढ़ में परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन ऑपरेशन की सफलता दर चिंता का विषय बनी हुई है। साल 2024 में जहां 6,240 लोगों ने नसबंदी कराई थी, वहीं 2025 में अब तक 3,042 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें 99 प्रतिशत महिलाएं हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि अलीगढ़ में नसबंदी फेल होने का यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछले चार वर्षों के रिकॉर्ड खंगालने पर पता चलता है कि लगभग 81 महिलाओं को इस स्थिति का सामना करना पड़ा है।
विशेषज्ञों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि बार-बार होते ऐसे मामले न केवल मेडिकल लापरवाही की ओर इशारा करते हैं, बल्कि सरकारी अस्पतालों में सर्जिकल गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं। हालांकि विभाग इसे ‘मेडिकल कॉम्प्लिकेशन’ का नाम दे रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत स्वास्थ्य ढांचे में सुधार की तत्काल आवश्यकता को दर्शाती है।








