अध्यात्म और मीडिया का संगम ही स्वस्थ समाज का आधार: मुनि श्री कमल कुमार


- तेरापंथ भवन में ‘समाज निर्माण में अध्यात्म और मीडिया की भूमिका’ विषय पर वैचारिक संगोष्ठी आयोजित
- वरिष्ठ पत्रकारों और प्रबुद्धजनों ने साझा किए विचार
बीकानेर, 2 जनवरी। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा गंगाशहर के तत्वावधान में गुरुवार को तेरापंथ भवन में एक विशेष वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उग्र विहारी तपोमूर्ति मुनि श्री कमल कुमार जी स्वामी के पावन सान्निध्य में आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य विषय ‘समाज निर्माण में अध्यात्म और मीडिया की भूमिका’ रहा। इस अवसर पर मुनि श्री ने अध्यात्म और मीडिया के अंतर्संबंधों को रेखांकित करते हुए समाज को नई दिशा प्रदान की।



सत्य ही धर्म है और सत्य ही मीडिया का मूल


मुनि श्री सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री कमल कुमार जी ने कहा कि जिस प्रकार शरीर से आत्मा का निकल जाना मृत्यु है, उसी प्रकार अध्यात्म के बिना जीवन और धर्म का कोई अस्तित्व नहीं है। उन्होंने कहा, “मीडिया का कार्य सत्य को सामने लाना है और सत्य का वास्तविक अर्थ ही धर्म है। जहाँ नैतिकता और प्रामाणिकता का अभाव होता है, वहाँ अशांति पनपती है।” जैन धर्म में दो प्रकार के धर्म की व्याख्या की गई है। उपासना धर्म एवं चारित्र धर्म। धर्म के क्षेत्र में व्रतों की अहमियत है। समाज में धन की भी अहमियत है। लेकिन धन तो यहीं रह जायेगा। धर्म – ध्यान, चारित्र, तपस्या सद्कर्म आपके साथ जायेगे।
उन्होंने कहा कि आत्मा अजर अमर अविनाशी है। मुनि श्री ने कहा कि संयम ही जीवन है। संयम ही धर्म है मीडिया को भी संयम बरतना चाहिए । धर्म के मर्म को समझों। जहाँ नैतिकता, प्रमाणिकता, सद्चरित्र नही होगा वहाँ अशांति होगी। जीवन में शांति अध्यात्म के बिना संभव नही है। मुनि श्री ने तपस्वी संत नमि मुनि का उल्लेख करते हुए गंगाशहर में इस सर्दी में हो रही तपस्याओं को उल्लेखनीय बताया।

अध्यात्म नींव तो मीडिया है लोकतंत्र का स्तंभ
विषय प्रवर्तन करते हुए जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि समाज की मजबूती आध्यात्मिक मूल्यों और मीडिया की जिम्मेदार भूमिका पर टिकी हुयी है। उन्होंने अध्यात्म को समाज का ‘चरित्र’ और मीडिया को ‘आंख-नाक-कान’ की संज्ञा दी। आज के डिजिटल युग में, जहां फेक न्यूज एक महामारी की तरह फैल रही है, आध्यात्म हमें विवेक देता है कि क्या साझा करें और क्या नहीं। मीडिया के माध्यम से आध्यात्मिक शिक्षाएं—जैसे योग, ध्यान या नैतिक कहानियां—प्रसारित की जा सकती हैं, जो युवाओं को सशक्त बनाएंगी। भारत जैसे देश में, जहां मीडिया की पहुंच गांव-गांव तक है, यह समन्वय राष्ट्र निर्माण को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है।
छाजेड़ ने कहा कि समाज निर्माण एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें आध्यात्म और मीडिया की भूमिका अपरिहार्य है। आध्यात्म हमें आंतरिक मजबूती देता है, जबकि मीडिया बाहरी जागृति। यदि हम दोनों का सही उपयोग करें, तो हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं जहां शांति, समानता और प्रगति हो। आज आवश्यकता है कि आध्यात्म को जीवन का हिस्सा बनाएं और मीडिया को जिम्मेदार बनाएं। तभी भारत विश्व गुरु के रूप में उभरेगा।
मुख्य वक्ता और राजस्थान पत्रिका के संपादक बृजेश सिंह ने प्रिंट मीडिया की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लिखने की कला में संयम तभी आता है जब भीतर अध्यात्म का वास हो। उन्होंने चरित्र निर्माण की शुरुआत परिवार से करने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि समाज के लिए हमारी भुमिका कहा शुरू हो रही है, कहा समाप्त हो रही है। हमारे लिखने से समाज में क्या प्रभाव पड़ रहा है। हमें लिखते समय संयम का परिचय देना है। यह सब बातों का ज्ञान आत्मा में अध्यात्म के बिना संभव नही है। अध्यात्म का निर्माण अपने घर परिवार से शुरू होता है। बचपन में ही बच्चों को नैतिकता, चरित्र निर्माण का प्रशिक्षण देकर आने वाली पीढ़ी को बुराईयों से बचा सकते हैं।
मीडिया पर अध्यात्म का अंकुश आवश्यक
बीकानेर प्रेस क्लब के अध्यक्ष खुशाल सिंह ने पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज की अनैतिक समस्याओं का समाधान गुरु ज्ञान और आध्यात्मिक अंकुश में ही निहित है। वहीं, ‘जार’ के प्रदेश अध्यक्ष श्री श्याम मारू ने कहा कि जब अध्यात्म और मीडिया की धाराओं का संगम होता है, तो समाज की बुराइयों का अंत सुनिश्चित हो जाता है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार और कुरीतियों के विरुद्ध मीडिया की लेखनी को अध्यात्म से ही शक्ति मिलती है। मारु ने कहा की क्या प्रकाशित करना व कया नहीं करना इसका विवेक रखना ही आध्यात्म है।
श्याम मारु ने कहा कि अध्यात्म और मीडिया का संगम हो जाये तो समाज में व्याप्त अनेक बुराईयों को पांव पसारने की जगह भी नही मिलेगी। उन लोगों बुराईयों का अंत हो जायेगा। समाज में व्याप्त बुराईयों को उजागर करने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। समाज में अच्छे काम करने वालों को मीडिया ही आगे लाता है जिससे औरों को भी प्रेरणा मिल सके।
पत्रकार व साहित्यकार हरीश बी शर्मा ने संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए कहा कि कुछ शब्द योजक चिन्हों के साथ जोड़कर देखे जाने से एक से लगने लगे, जबकि इनमें जमीन आसमान का फर्क है। धर्म-अध्यात्म के साथ भी ऐसा ही हादसा हुआ है।उन्होंने कहा कि मेरा धर्म पत्रकारिता हो सकता है, किसी का धर्म व्यवसाय हो सकता है या कोई वकील, चिकित्सक या इंजीनियर होकर इसे धर्म के रूप में स्वीकार कर सकता है, लेकिन आध्यात्मिक होने का अवसर व्यक्ति मात्र को मिलता है। आत्मिक उन्नयन का मार्ग चयन करना ही अध्यात्म है। आप धारण किसे करते हैं, यह आपकी रुचि, परम्परा या आवश्यकता से भी जुड़ा हो सकता है।
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि 1995 में संवित् सोमगिरि जी ने मेरी शंकाओं का शमन करते हुए समझाया कि विष्ठा भी सत्य है, लेकिन इसे हम हाथ में लेकर तो नहीं आते। मुनि जयकुमार जी ने कहा मर्म का बेधन नहीं करना ही श्रेयस्कर है।शर्मा ने कहा कि इन दोनों संतों से मेरा सवाल था कि इलेवंथ आ’र्स में मेरे सामने सत्य अनेक-अनेक रूपों में सामने आता है, ऐसे में मुझे अपने समाचार में किसका समावेश करना चाहिए और किसका नहीं?उन्होंने कहाकी अध्यात्म और नैतिकता की शक्ति की वजह से ही मीडिया तथ्यों को दृढ़ता से समाज के सामने रखता है। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनेक कुरूतियों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

साहित्य और पताका से हुआ पत्रकारों का सम्मान
इस गरिमामय समारोह में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा द्वारा बीकानेर के कलम के धनी पत्रकारों का साहित्य एवं दुपट्टा पहनाकर अभिनंदन किया गया। सभा के अध्यक्ष नवरतन बोथरा ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन सभा के मंत्री जतनलाल संचेती ने किया।
इस अवसर पर अमरचंद सोनी, पवन छाजेड़, मांगीलाल लूणिया सहित तेरापंथी सभा के अनेक पदाधिकारी, प्रबुद्ध नागरिक और मीडिया जगत की हस्तियां उपस्थित रहीं।








