वैदिक तर्कवाद से लोक संस्कृति के उत्थान में अग्रणी रहे स्वामी दयानंद सरस्वती; अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. मेघना शर्मा का व्याख्यान


बीकानेर\ जोधपुर, 17 जनवरी । राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं पर केंद्रित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन विद्वानों ने स्वामी दयानंद सरस्वती के क्रांतिकारी विचारों पर गहरा मंथन किया। जोधपुर के जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU) के इतिहास विभाग द्वारा आयोजित ‘राजस्थान की लोक संस्कृति: विभिन्न आयाम’ विषयक संगोष्ठी में महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय (MGSU), बीकानेर के इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. मेघना शर्मा ने तकनीकी सत्र की अध्यक्षता की।


अपने संबोधन में डॉ. मेघना शर्मा ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती का उदय भारतीय इतिहास के उस मोड़ पर हुआ, जब अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त वर्ग अपनी ही लोक संस्कृति को हीन और पिछड़ा मानकर उससे किनारा कर रहा था। ऐसे समय में महर्षि दयानंद ने न केवल लोक संस्कृति का गौरव पुनः स्थापित किया, बल्कि ऋषि मेलों और लोक गीतों के माध्यम से समाज में सुधारवादी दृष्टिकोण का संचार किया। उन्होंने विशेष रूप से शिक्षित महिलाओं को लोक संस्कृति की मुख्यधारा से जोड़ने में आर्य समाज की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।


वैदिक तर्कवाद की कसौटी पर लोक परंपराएं डॉ. शर्मा ने तर्क दिया कि दयानंद सरस्वती ने लोक आस्थाओं और परंपराओं को केवल ‘परंपरा’ होने के नाते स्वीकार नहीं किया, बल्कि उन्हें वैदिक तर्कवाद के मापदंड पर परखा। उन्होंने लोक भाषाओं और साहित्य के उत्थान में दयानंद के योगदान को अद्वितीय बताते हुए कहा कि उन्होंने अंधविश्वासों को हटाकर संस्कृति को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
संगोष्ठी के इस महत्वपूर्ण तकनीकी सत्र में डॉ. मेघना शर्मा के साथ सह-अध्यक्ष के रूप में बनस्थली विद्यापीठ की डॉ. शिल्पी गुप्ता, सोफिया कॉलेज अजमेर की डॉ. पर्सिस लतिका दास और बेल्जियम से आईं शोधार्थी मारग्रेट योंकेरी मंच पर उपस्थित रहीं। गौरतलब है कि इस अंतरराष्ट्रीय समागम का उद्घाटन राजस्थान धरोहर प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत द्वारा किया गया था। आयोजन सचिव डॉ. ललित पंवार ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इस संगोष्ठी ने राजस्थान की लोक संस्कृति को वैश्विक पटल पर एक नई पहचान देने का प्रयास किया है।








