“पुरुषों की परेशानियों को नजरअंदाज नहीं कर सकते”, बीमार माता-पिता की सेवा कर रहे पति के पक्ष में खारिज हुई ट्रांसफर अर्जी
पुरुषों की परेशानियों को नजरअंदाज नहीं कर सकते


- राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
जयपुर/बीकानेर, 15 फरवरी। राजस्थान उच्च न्यायालय की जोधपुर पीठ ने वैवाहिक विवादों के मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संतुलित निर्णय सुनाया है। जस्टिस रेखा बोराणा की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि महिलाएं अक्सर पीड़ित होती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि कानूनी प्रक्रिया में पुरुषों की व्यवहारिक कठिनाइयों और उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियों को अनदेखा कर दिया जाए। न्यायालय ने यह टिप्पणी जयपुर निवासी एक महिला द्वारा बीकानेर से जयपुर केस ट्रांसफर करने की याचिका को खारिज करते हुए की।


अदालत ने अपने आदेश में ‘समानता’ के सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि न्याय का तराजू दोनों पक्षों के लिए बराबर होना चाहिए। कोर्ट ने माना कि यदि यह मामला जयपुर स्थानांतरित किया जाता है, तो पति को पत्नी की तुलना में कहीं अधिक गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि 5 फरवरी को सुनाए गए इस फैसले को सिविल ट्रांसफर मामलों में एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इसमें पहली बार पति की व्यक्तिगत और स्वास्थ्य संबंधी जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दी गई है।


बीमार माता-पिता का इकलौता सहारा है पति
मामले की गहराई में जाएं तो पति (49) बीकानेर में रहता है और अपने 80 वर्षीय बुजुर्ग पिता तथा कैंसर से पीड़ित बिस्तर पर पड़ी माता का इकलौता सहारा है। पति की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट उदयशंकर आचार्य ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर अपने माता-पिता के इलाज और देखभाल की पूरी जिम्मेदारी है, जिसके चलते उनका बार-बार जयपुर जाना संभव नहीं है।
दूसरी ओर, पत्नी (45) का तर्क था कि वह साल 2005 से जयपुर में अपने दो बेटों के साथ रह रही है और वहीं कार्यरत है, इसलिए उसे बीकानेर आने में असुविधा होती है। हालांकि, पति पक्ष ने उदारता दिखाते हुए यह प्रस्ताव रखा कि यदि पत्नी बीकानेर पेशी पर आती है, तो वह उसका पूरा यात्रा खर्च वहन करने को तैयार है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ठोस आधार के बिना नहीं होगा ट्रांसफर
न्यायालय ने रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद पाया कि पत्नी ने जयपुर में अन्य मामले लंबित होने का दावा तो किया, लेकिन उनका कोई स्पष्ट विवरण प्रस्तुत नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल आर्थिक परेशानी का हवाला देकर केस ट्रांसफर नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब पति खर्च देने को तैयार हो।
हाईकोर्ट ने माना कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे माता-पिता को छोड़कर पति का बीकानेर से जयपुर आना व्यावहारिक रूप से कठिन है। न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए संतुलित निर्णय दिया और पत्नी को निर्देश दिया कि वह पेशी खर्च के लिए बीकानेर फैमिली कोर्ट में आवेदन कर सकती है।
