मातृभाषा की हुंकार- “ज्ञापन बहुत हुए, अब सदन में एकजुटता दिखाएं जनप्रतिनिधि -नाचीज़ बीकानेरी ने सरकार को घेरा

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quicjZaps 15 sept 2025

बीकानेर, 18 फरवरी। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता और शिक्षा में तीसरी भाषा के रूप में शामिल करने की वर्षों पुरानी मांग अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। राजस्थानी भाषा प्रेमी और साहित्यकार ‘नाचीज़ बीकानेरी’ ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी पर गहरा क्षोभ प्रकट किया है। उन्होंने सीधे तौर पर राजस्थान के जनप्रतिनिधियों को निशाने पर लेते हुए कहा कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही इस मुद्दे को “हल्के” में ले रहे हैं, जिसके कारण करोड़ों राजस्थानियों की मातृभाषा आज भी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है।

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नाचीज़ बीकानेरी ने कड़े शब्दों में कहा कि अब तक विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और प्रधानमंत्री तक को अनगिनत ज्ञापन दिए जा चुके हैं, धरने-प्रदर्शन हुए और विदेशों में बैठे प्रवासियों ने भी आवाज बुलंद की, लेकिन परिणाम आज भी ‘वही ढाक के तीन पात’ ढाक के तीन पात है।

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“शपथ लेकर वाह-वाही लूटी, अब काम भी करके दिखाएं”
विज्ञप्ति में जनप्रतिनिधियों के दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रहार किया गया है।
दिखावे की राजनीति: नाचीज़ बीकानेरी ने याद दिलाया कि कई विधायकों ने विधानसभा में राजस्थानी भाषा में शपथ लेकर खूब सुर्खियां बटोरीं, लेकिन जब सदन में कानून बनाने या सामूहिक दबाव डालने की बात आती है, तो वे खामोश हो जाते हैं।

मजबूत स्तंभ: उन्होंने कहा कि यदि वर्तमान और भूतपूर्व विधायक दलगत राजनीति से ऊपर उठकर संयुक्त रूप से इस मुद्दे को उठाएं, तो सफलता सुनिश्चित है। वे राजस्थान के मजबूत ‘थंभ’ (स्तंभ) हैं, जिन्हें अपनी ताकत का एहसास करना होगा।

21 फरवरी: ‘मातृभाषा दिवस’ पर आर-पार की जंग का आह्वान
आगामी 21 फरवरी (अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस) को लेकर नाचीज़ बीकानेरी ने सभी राजनैतिक दलों को एक मंच पर आने की चुनौती दी है:

अनिश्चितकालीन कदम: उन्होंने मांग की है कि वर्तमान विधानसभा सत्र के दौरान सभी विधायक एकजुट होकर राजस्थानी को मान्यता दिलाने के लिए अनिश्चितकालीन और ठोस कदम उठाएं।

एक जाजम पर संगठन: साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों से भी अपील की गई है कि सभी संगठन एक जाजम पर बैठकर इस आंदोलन को अनवरत जारी रखें।

10 करोड़ राजस्थानियों के सम्मान का सवाल
विज्ञप्ति के अंत में यह स्पष्ट किया गया कि राजस्थानी को मान्यता मिलने से हिंदी भाषा को कोई नुकसान नहीं, बल्कि बल ही मिलेगा। नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान है, ऐसे में राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार की टालमटोल अब असहनीय है। “यह 10 करोड़ राजस्थानियों के सम्मान की बात है, जिसे सदन और संसद में बुलंद करना अब जनप्रतिनिधियों की नैतिक जिम्मेदारी है।”

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