‘लोक सूं लाइक’ तक तो पहुंची राजस्थानी, पर मान्यता की डगर अब भी दूर

'लोक सूं लाइक' तक तो पहुंची राजस्थानी, पर मान्यता की डगर अब भी दूर
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quicjZaps 15 sept 2025
  • मातृभाषा दिवस पर श्रीडूंगरगढ़ में ग्यान गोठ

श्रीडूंगरगढ़, 21 फरवरी। विश्व मातृभाषा दिवस के अवसर पर मरूभूमि शोध संस्थान द्वारा आयोजित विशेष ‘ग्यान गोठ’ में राजस्थानी भाषा के आधुनिक स्वरूप और उसकी चुनौतियों पर गंभीर मंथन हुआ।
“राजस्थानी: लोक से लाइक तक” विषय पर केंद्रित इस चर्चा में विद्वानों ने माना कि सोशल मीडिया ने राजस्थानी कंटेंट को वैश्विक पहचान तो दी है, लेकिन भाषाई मान्यता के संवैधानिक लक्ष्य को प्राप्त करने में अब भी स्क्रिप्ट और गंभीर प्रयासों की कमी खल रही है। कार्यक्रम के दौरान साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली चार विभूतियों को प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया।

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सोशल मीडिया और राजस्थानी-लोकप्रियता बनाम मान्यता
मुख्य वक्ता और युवा कथाकार हरीश बी. शर्मा ने विषय प्रवर्तन करते हुए एक कड़वा सच साझा किया। उन्होंने कहा कि लोकप्रियता बनाम एजेंडा में यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर राजस्थानी कंटेंट को करोड़ों ‘लाइक’ मिल रहे हैं, लेकिन यह लोकप्रियता भाषा को राजभाषा का दर्जा दिलाने में सहायक सिद्ध नहीं हो रही है।

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स्क्रिप्ट का अभाव

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के पास अच्छी स्क्रिप्ट की कमी है, जिससे कंटेंट केवल मनोरंजन तक सीमित रह जाता है, भाषाई गंभीरता गायब है। आलोचक डॉ. चेतन स्वामी ने बताया कि राजस्थानी कंटेंट की पहुंच 15 करोड़ लोगों तक है, जिसमें हरियाणा और पंजाब के लोग भी शामिल हैं, जो इसकी ताकत को दर्शाता है।

साहित्यिक विभूतियों का सम्मान समारोह में राजस्थानी साहित्य की विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट कार्य के लिए निम्नलिखित साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया। महाराणा प्रताप राजस्थानी साहित्य सृजन पुरस्कार डॉ. तेजसिंह जोधा को ,पं. मुखराम सिखवाल स्मृति पुरस्कारडॉ. कृष्णा कुमारी को , सूर्य प्रकाश बिस्सा स्मृति सम्मानश्रीमती प्रेम को तथा डूंगर कल्याणी स्मृति राजस्थानी बाल साहित्य सम्मान पूर्ण शर्मा को प्रदान किया गया।

‘पूर्ण’नई पीढ़ी और पाठकों को जोड़ने का संकल्प

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार श्याम महर्षि ने बल दिया कि राजस्थानी लोक संगीत और साहित्य पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। उन्होंने एक ऐसे अभियान की आवश्यकता जताई जिससे राजस्थानी पुस्तकें जन-जन तक पहुंचें। वहीं, वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि मातृभाषा को विद्यार्थियों के बीच ले जाकर नए पाठक तैयार करना समय की सबसे बड़ी मांग है। सत्र का सफल संचालन रवि पुरोहित ने किया और आभार कवयित्री भगवती पारीक ‘मनु’ ने व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ. के.सी. सोनी, डॉ. मदन सैनी और डॉ. महावीर पंवार सहित क्षेत्र के अनेक प्रबुद्ध नागरिक और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

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