‘हेडाऊ-मेहरी’ रम्मत पर संवाद और पुस्तक भेंट, 28 की रात सजेगा मरुनायक चौक

'हेडाऊ-मेहरी' रम्मत पर संवाद और पुस्तक भेंट, 28 की रात सजेगा मरुनायक चौक
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quicjZaps 15 sept 2025

मरुनगरी की लोक संस्कृति का अनूठा उत्सव

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बीकानेर, 26 फरवरी। बीकानेर की विश्वप्रसिद्ध रम्मत संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ी। मरुनायक चौक स्थित ‘श्री मरुनायक कला केन्द्र’ के तत्वावधान में आयोजित होने वाली “हेडाऊ-मेहरी” रम्मत को लेकर सूचना केंद्र में कलाकारों और पाठकों के बीच जीवंत संवाद हुआ। इस अवसर पर रम्मत के इतिहास और कथानक पर आधारित एक विशेष पुस्तक सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के उप निदेशक व राजस्थानी लेखक हरी शंकर आचार्य को भेंट की गई।

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बीकानेर की विरासत का प्रतीक है रम्मत
उप निदेशक हरी शंकर आचार्य ने पुस्तक स्वीकार करते हुए कहा कि रम्मत बीकानेर की समृद्ध लोक नाट्य परंपरा का जीवंत प्रतीक है।
पीढ़ियों का मार्गदर्शन: आचार्य के अनुसार, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सहयोग से प्रकाशित यह पुस्तक आने वाली पीढ़ी के लिए शोध और जानकारी का मुख्य स्रोत बनेगी, जिसमें रम्मत के संवाद, गीत और ऐतिहासिक तथ्यों का समावेश है।

इतिहास की झलक: पुस्तक के प्रधान संपादक और पिछले 25 वर्षों से ‘हेडाऊ’ का किरदार निभाने वाले शिव शंकर गज्जाणी पुरोहित ने बताया कि करीब 150 साल पहले यह रम्मत देशनोक के चारण समुदाय द्वारा की जाती थी। इसके बाद यह सेवगों के चौक और फिर अनवरत मरुनायक चौक की पहचान बन गई।

क्या है ‘हेडाऊ-मेहरी’? घोड़ों के पारखी राजा और रानी की प्रेम गाथा
शिव शंकर पुरोहित ने रम्मत के कथानक पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया:

पात्र और अर्थ: ‘हेडाऊ’ का शाब्दिक अर्थ ‘घोड़ों का पारखी’ होता है। यह रम्मत कुंभलगढ़ के राजा (महाराणा सांगा और प्रताप के वंशज) की निजी जिंदगी, उनके प्रेम, विरह और राजसी ठाठ-बाट पर आधारित है।

संवाद शैली: राजा (हेडाऊ) और रानी (मेहरी) के बीच होने वाले संवाद ‘नूरसा’ और ‘दासी’ के माध्यम से अत्यंत रोचक, हास्य और व्यंग्य शैली में प्रस्तुत किए जाते हैं।

सांस्कृतिक परंपरा: रम्मत के दौरान पुत्र जन्म का दृश्य दिखाया जाता है, जिसमें ‘गीगों’ के साथ लुप्त हो रहे प्राचीन राजस्थानी गीत गाए जाते हैं। इस दौरान छतों पर बैठी महिलाएं कांसी की थाली बजाकर खुशियां मनाती हैं, जो बीकानेर की अनूठी परंपरा है।

कलाकारों की गौरवशाली परंपरा
मरुनायक कला केन्द्र के अध्यक्ष अजय कुमार देराश्री ने बताया कि विक्रम संवत् 1873 से शुरू हुई इस रम्मत में गज्जाणी पुरोहित परिवार का विशेष योगदान रहा है। मुरली मनोहर पुरोहित से शुरू हुई यह परंपरा राम लाल गज्जाणी, शिव शंकर पुरोहित (लक्खूजी) और महेश चन्द्र पुरोहित तक निरंतर जारी है। साथ ही शिव प्रताप (भाइयोंजी), पद्दू पुरोहित और गणेश जोशी जैसे कलाकारों ने भी ‘हेडाऊ’ के किरदार को अमर बनाया है।

कार्यक्रम विवरण: नोट कर लें समय
दिनांक: 28 फरवरी (शनिवार) की पूरी रात।

समापन: 1 मार्च (रविवार) की सुबह तक।

स्थान: मरुनायक चौक, बीकानेर।

विशेष आकर्षण: श्रृंगार और वीर रस का संगम, आकर्षक वेशभूषा और पारंपरिक संगीत।

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