घुड़सवारी के शिखर पुरुष जेठमल भाटी का निधन

घुड़सवारी के शिखर पुरुष जेठमल भाटी का निधन
shreecreates
quicjZaps 15 sept 2025
  • दिल्ली रेसकोर्स तक बुलंद की थी बीकानेर की साख

बीकानेर, 11 फ़रवरी । मरुधरा के विख्यात घुड़सवार, कला साधक और हड्डी रोगों के पारंपरिक उपचार में सिद्धहस्त जेठमल भाटी का मंगलवार को निधन हो गया। नत्थूसर बास निवासी 75 वर्षीय भाटी के निधन की खबर से बीकानेर के खेल, कला और समाज सेवा जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। वे कम्यूनिटी वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष कन्हैयालाल भाटी के पिता थे। उनकी जीवन यात्रा साहस, सेवा और संस्कारों का एक विरल उदाहरण रही।

indication
L.C.Baid Childrens Hospiatl

अस्सी के दशक में जब घुड़सवारी के क्षेत्र में बीकानेर की अपनी एक विशेष पहचान थी, तब जेठमल भाटी एकमात्र ऐसे घुड़सवार बनकर उभरे जिन्होंने दिल्ली रेसकोर्स के मैदान में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। घोड़ों के साथ उनके गजब के संतुलन और आत्मविश्वास ने बीकानेर के नाम को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया। वे अपनी पीढ़ी के उन चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल थे, जिनका अनुशासन आज भी युवा घुड़सवारों के लिए एक मानक माना जाता है।

pop ronak

सेवा का तप: स्पर्श मात्र से दूर करते थे हड्डी के रोग

जेठमल भाटी केवल एक खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता के प्रति अत्यंत संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी थे। उन्हें हड्डी रोगों के पारंपरिक ज्ञान में विलक्षण महारत हासिल थी। बच्चों की हसली (कॉलर बोन) का खिसकना हो, पुरानी मोच हो या हड्डियों का असहनीय दर्द, भाटी के अनुभवजन्य उपचार और स्नेहिल स्पर्श से लोग जल्द ही स्वस्थ हो जाते थे। उनका यह सेवा कार्य किसी व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक तप की तरह था। वे प्रतिदिन नि:शुल्क 40-50 मरीजों की सेवा करते थे, जिनमें दूर-दराज से आए लोग बड़ी उम्मीद लेकर पहुँचते थे।

कला जगत की अपूरणीय क्षति: ‘हरिश्चंद्र’ की भूमिका से मिली थी पहचान
कला और संस्कृति के प्रति उनका समर्पण बचपन से ही अटूट था। महज 8 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने पारंपरिक रम्मत में ‘राजा हरिश्चंद्र’ का पात्र निभाकर अपनी अभिनय यात्रा का श्रीगणेश किया था। सत्य और संवेदना के प्रति उनके आग्रह ने उन्हें ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र’ की भूमिका में जीवंत कर दिया, जिसकी चर्चा आज भी रम्मत प्रेमी करते हैं। वे एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति से राजस्थान की लोक संस्कृति को समृद्ध किया। उनके निधन को बीकानेर की खेल और सांस्कृतिक विरासत के एक अध्याय का अंत माना जा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *