राजस्थानी को मान्यता दिलाने के लिए प्रदेश के 25 जिलों में साहित्यकारों ने रखा उपवास

राजस्थानी को मान्यता दिलाने के लिए प्रदेश के 25 जिलों में साहित्यकारों ने रखा उपवास
shreecreates
quicjZaps 15 sept 2025
  • मातृभाषा के लिए ‘मौन क्रांति’

बीकानेर, 21 फरवरी । विश्व मातृभाषा दिवस के अवसर पर आज राजस्थान की मरु-भाषा को उसका संवैधानिक हक दिलाने के लिए एक अनूठा और शांतिपूर्ण आंदोलन देखने को मिला। राजस्थानी युवा लेखक संघ एवं प्रज्ञालय संस्थान के आह्वान पर प्रदेश भर के सैकड़ों साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और भाषा प्रेमियों ने एक दिवसीय राज्य स्तरीय उपवास रखकर अपनी मांगों को पुरजोर तरीके से सरकार के समक्ष रखा।

indication
L.C.Baid Childrens Hospiatl

यह उपवास न केवल राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए था, बल्कि नई शिक्षा नीति के तहत प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा बनाने और इसे प्रदेश की दूसरी राजभाषा घोषित करने की एक बड़ी मुहिम के रूप में उभरा।

pop ronak

25 जिलों में एकजुटता: सोजत से जयपुर तक गूंजी मांग
आंदोलन के प्रवर्तक और वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने बताया कि यह उपवास एक ‘नवाचार’ के रूप में सफल रहा। प्रदेश के लगभग 25 जिलों में एक साथ साहित्यकारों और संस्कृति प्रेमियों ने अन्न-जल का त्याग कर राजस्थानी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई।

प्रमुख मांगें: राजस्थानी को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करना, राजस्थान की दूसरी राजभाषा बनाना और प्राथमिक शिक्षा राजस्थानी में अनिवार्य करना।

ज्ञापन: आंदोलन के संयोजक अब्दुल समद राही ने सोजत (पाली) एसडीएम के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर इन मांगों को शीघ्र पूरा करने का आग्रह किया।

बीकानेर से लेकर कोटा-उदयपुर तक जुटे दिग्गज
इस राज्य स्तरीय उपवास को प्रदेश के कोने-कोने से व्यापक समर्थन मिला। बीकानेर में कमल रंगा, बुलाकी शर्मा, जैन लूणकरण छाजेड़ , कासिम बीकानेरी और डॉ. नरसिंह बिन्नानी सहित अनेक शिक्षाविदों ने उपवास रखा।

जोधपुर और पाली: वाजिद हसन काजी और पवन कुमार पाण्डे ने मोर्चा संभाला।

मेवाड़ और हाड़ौती: उदयपुर से हेमलता दाधीच और कोटा से बद्री प्रसाद मेहरा के नेतृत्व में समर्थकों ने उपवास किया।

राजधानी जयपुर: सुमीत रंगा और सीमा मनानी सहित कई कार्यकर्ताओं ने सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

“भाषा केवल संवाद नहीं, विरासत है”
उपवास के समापन पर कमल रंगा ने संबोधित करते हुए कहा कि भाषा किसी भी समाज की बौद्धिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान होती है। करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ी राजस्थानी को यदि उसका वाजिब हक नहीं मिलता, तो यह हमारी समृद्ध संस्कृति के संरक्षण के लिए एक बड़ा खतरा होगा। उन्होंने जोर दिया कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए प्राथमिक शिक्षा का माध्यम राजस्थानी होना अनिवार्य है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *