लोक संस्कृति से जुड़कर ही संभव है प्रकृति का संरक्षण — प्रो. श्याम सुंदर ज्याणी
लोक संस्कृति से जुड़कर ही संभव है प्रकृति का संरक्षण — प्रो. श्याम सुंदर ज्याणी


बीकानेर, 17 फरवरी। बीकानेर के अजित फाउण्डेशन द्वारा आयोजित ‘संवाद श्रृंखला’ के तहत मंगलवार को “पर्यावरण एवं समाज” विषय पर एक महत्वपूर्ण विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, डूंगर कॉलेज के समाजशास्त्र व्याख्याता एवं विख्यात पर्यावरणविद् प्रो. श्याम सुन्दर ज्याणी ने समाज और प्रकृति के अंतर्संबंधों पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें अपनी जड़ों और लोक संस्कृति की ओर लौटना होगा।


प्रो. ज्याणी ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारा रहन-सहन और खान-पान तो बदल गया है, लेकिन विचारों में वह परिपक्वता नहीं आ पाई है जो प्रकृति के प्रति होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हम पर्यावरण से जो कुछ भी प्राप्त कर रहे हैं, उसे उपकार के रूप में स्वीकार करना चाहिए। जब तक समाज में व्यापक विचार और तार्किक चेतना का विकास नहीं होगा, तब तक एक सुदृढ़ समाज और स्वच्छ पर्यावरण की परिकल्पना अधूरी है।”


सैद्धांतिक नहीं, प्रायोगिक शिक्षा की आवश्यकता
प्रो. ज्याणी ने शिक्षा पद्धति पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल किताबों से पर्यावरण नहीं बचेगा। इसके लिए प्रायोगिक ज्ञान का होना अनिवार्य है।
लोक जीवन का महत्व: हमारे पूर्वजों की लोक संस्कृति में प्रकृति संरक्षण के सूत्र छिपे हैं। यदि हम अपने आस-पास के सामाजिक मूल्यों और लोक जीवन के प्रति सजग हो जाएं, तो पर्यावरण स्वतः संरक्षित हो जाएगा। छोटे प्रयासों की शक्ति: उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि आज हमारे द्वारा किए गए छोटे-छोटे प्रयास ही कल व्यापक रूप लेंगे, जिससे आने वाली पीढ़ियां पोषित होंगी।
मानसिक चेतना और सामाजिक सरोकार
कार्यक्रम समन्वयक संजय श्रीमाली ने शिक्षा को जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार गहरी जड़ों वाला वृक्ष ही वटवृक्ष बनकर सबको छाया देता है, वैसे ही मानसिक चेतना से लैस युवा ही समाज को सशक्त बना सकते हैं। गोष्ठी में अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार साझा किए। डॉ. रश्मि बिस्सा एवं डॉ. सन्तोष बिस्सा: महिला शिक्षा और पर्यावरण के अंतर्संबंधों पर बात की। डॉ. रितेश व्यास: उन्होंने ऐतिहासिक खेजड़ी आन्दोलन की व्यापकता का उल्लेख करते हुए बताया कि राजस्थान का इतिहास प्रकृति के लिए बलिदान की गाथाओं से भरा है।
सम्मान और सहभागिता
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित छात्राओं और प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर प्रो. नरसिंह बिन्नानी, डॉ. मोहम्मद फारूक और नवनीत आचार्य सहित राजस्थान महिला शिक्षक प्रशिक्षक महाविद्यालय की अनेक छात्राएं उपस्थित रहीं। शिक्षाविद् प्रो. नरसिंह बिन्नानी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए इस संवाद को भविष्य के लिए मार्गदर्शक बताया।
