आध्यात्मिक आभा के साथ ‘योगक्षेम वर्ष’ का भव्य शंखनाद: आचार्यश्री महाश्रमण ने लाडनूं की धरा से दिया मंगल पाथेय
आध्यात्मिक आभा के साथ 'योगक्षेम वर्ष' का भव्य शंखनाद


लाडनूं (डीडवाना-कुचामन), 19 फरवरी। वर्षों की प्रतीक्षा और त्रिदिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान के फलित होने का वह ऐतिहासिक क्षण गुरुवार को साकार हो उठा, जब जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में ‘योगक्षेम वर्ष’ का मंगल शुभारम्भ हुआ। फाल्गुन शुक्ला द्वितीया का यह दिन अत्यंत विशिष्ट रहा, क्योंकि इसी दिन धर्मसंघ के अष्टमाचार्य कालूगणी का जन्मदिवस भी मनाया गया। करीब 37 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद लाडनूं के जैन विश्व भारती परिसर में इस विशेष वर्ष की पुनरावृत्ति हो रही है।
हमारे धर्मसंघ के लिए योगक्षेम वर्ष मंगलमय हो। इस दौरान यदि हम अहिंसा, संयम की साधना करते हैं और तप तपते हैं तो यह योगक्षेम वर्ष मंगलमय हो ही जाएगा। तीन दिनों का अनुष्ठान मानों योगक्षेम वर्ष का शिलान्यास था। अब योगक्षेम वर्ष की कालावधि शुरु हो गई है। यह हमारे विकास में सहायक बने। इस दौरान अनेक रूपों में प्रशिक्षण का कार्य चलता रहे। चिंतन, मंथन, निर्णय के लिए भी यह वर्ष महत्त्वपूर्ण है। धर्मसंघ की साधना कैसे पुष्ट हो, इसका प्रयास होना चाहिए। आचार, विचार पक्ष कैसे मजबूत हो। इस प्रकार शिक्षण-प्रशिक्षण व चिंतन-मंथन के द्वारा योगक्षेम वर्ष को अच्छा बनाने का प्रयास किया जा सकता है। इस योगक्षेम वर्ष की कालावधि तक यदि ज्ञानात्मक दृष्टि व जानकारी के दृष्टि से बहिर्विहार में रहने वाले साधु-साध्वियां भी यदि ठिकाणे में सहज रूप में यूट्यूब आदि के माध्यम से टीवी में प्रसारण हो रहा हो तो देख सकते हैं, इसके लिए अनापत्ति है। इस दौरान चलने वाले शिक्षण-प्रशिक्षण के बाद परीक्षा भी होने के बाद ही कोई डिग्री या उपाधि प्रदान की जाए। हमारे अष्टम आचार्यश्री कालूगणी का जन्मदिवस है। आज का दिन अणुव्रत, पारमार्थिक शिक्षण संस्था से जुड़ा हुआ है। यह वर्ष धर्मसंघ को ऊंचाई प्रदान करने वाला सिद्ध हो।
आचार्यश्री तुलसी के समय योगक्षेम वर्ष आयोजित हुआ था और लगभग वहीं प्रांगण आज भी हमें प्राप्त है, जहां योगक्षेम वर्ष के प्रारम्भ की पुनरावृत्ति हुई है। महाश्रमणी साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी ने आचार्यश्री तुलसी के समय भी योगक्षेम वर्ष का निवेदन रखा था और उन्होंने ही मेरे सामने भी इसका निवेदन रखा था। उनके कथन को स्वीकार कर योगक्षेम वर्ष की घोषणा की, वह घोषणा आज प्रारम्भ हो रहा है। जिन्होंने निवेदन किया था वे तो अब सदेह नहीं हैं, परन्तु उस निवेदन के संदर्भ में साध्वीप्रमुखा अब विश्रुतविभाजी को मान लेता हूं।
नूतन भवनों आर्जवम्, मैत्री सदन, अणुव्रत भवन एवं बोधिगृहम् भवनों का लोकार्पण और ज्ञान की गंगा
योगक्षेम वर्ष के इस मांगलिक अवसर पर जैन विश्व भारती परिसर में चार नए भवनों का लोकार्पण आचार्यश्री के मंगलपाठ के साथ संपन्न हुआ। ये भवन आगामी वर्षों में धर्मसंघ की गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बनेंगे।
इन भवनों का निर्माण इस शुभारम्भ के अवसर पर जैन विश्व भारती में विभिन्न आध्यात्मिक-धार्मिक व सामाजिक गतिविधियों के कुशल संचालन के लिए अर्जवम् भवन, मैत्री सदन, अणुव्रत भवन व बोधिगृहम् का लोकार्पण युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगलपाठ के साथ प्रारम्भ हुआ।

मैत्री सदन ( बीकानेर भवन ) का निर्माण बीकानेर के श्री चम्पालाल , गणेशमल, हेमंत-राजेश, धर्मेंद्र, मुदित आयुष, हर्षित बोथरा परिवार, बीकानेर के सौजन्य से हुआ। योगक्षेम वर्ष में तेरापंथी सभा गंगाशहर , बीकानेर व आचार्य तुलसी शांति प्रतिष्ठान व बोथरा परिवार की तरफ़ से चौका सेवा व्यवस्था चालू रहेगी। बीकानेर से शांतिलाल भंसाली सहित अनेक श्रावक – श्राविकाएं तथा गंगाशहर से जैन लूणकरण छाजेड़ , अमरचन्द सोनी , जतनलाल संचेती , भेरुंदान सेठिया व दीपक आंचलिया इत्यादि लोग उपस्थित हुए। गणेशमल बोथरा ने सभी का आभार ज्ञापन किया।
पुस्तका विमोचन: मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान आचार्यश्री के प्रवचनों पर आधारित जैन विश्व भारती द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘आठ बातें ज्ञान की’ का लोकार्पण पूज्यचरणों में किया गया।
“शिक्षण, प्रशिक्षण और चिंतन का वर्ष” – आचार्यश्री का उद्बोधन
आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को संबोधित करते हुए ‘योगक्षेम वर्ष 2026-27’ की आधिकारिक घोषणा की। उन्होंने इस वर्ष के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आगमिक आधार: ‘योगक्षेम’ शब्द आगम से लिया गया है, जो साधना की प्राप्ति (योग) और उसकी सुरक्षा (क्षेम) का प्रतीक है।
साधना का शिलान्यास: आचार्यश्री ने कहा कि पिछला तीन दिवसीय अनुष्ठान इस वर्ष का शिलान्यास था। अब समय चिंतन, मंथन और निर्णय का है। यह वर्ष धर्मसंघ को नई ऊंचाइयां प्रदान करेगा।
तकनीकी अनापत्ति: आचार्यश्री ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि इस दौरान होने वाले शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बहिर्विहार ( लाडनूं क्षेत्र से बाहर) में रहने वाले साधु-साध्वियां भी यूट्यूब या टीवी के माध्यम से देख सकते हैं, जिसके लिए उन्होंने सहर्ष अनापत्ति प्रदान की।
भक्ति और प्रज्ञा का अनूठा संगम
कार्यक्रम के दौरान साध्वीवृंद ने ‘प्रज्ञा गीत’ की सुमधुर प्रस्तुति दी, वहीं मुमुक्षु बहनों ने भी गीत के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। आचार्यश्री ने विशेष रूप से तत्त्वज्ञान के विद्यार्थियों और प्रेक्षाध्यान के शिविरार्थियों को मंगल प्रेरणा दी।
