जैन धर्मऔर साधना का मर्म-“राग-द्वेष को कम कर वीतरागता की ओर बढ़ना ही मुख्य लक्ष्य” – साध्वी विशदप्रज्ञा

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गंगाशहर, 9 फ़रवरी । तेरापंथी सभा, गंगाशहर के तत्वावधान में आयोजित विशेष आध्यात्मिक प्रवचन कार्यक्रम में साध्वी श्री विशदप्रज्ञा जी ने जैन दर्शन की प्राचीनता और साधना के गहन सूत्रों पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि ‘जिन शासन’ का विशाल स्तंभ चार तीर्थों—साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका—पर टिका हुआ है। जैन धर्म, जिसे प्राचीन काल में ‘निग्रंथ धर्म’ और ‘श्रमण धर्म’ के नाम से जाना जाता था, उसका मूल उद्देश्य आत्मा को राग और द्वेष से मुक्त कर वीतरागता की परम अवस्था तक ले जाना है।

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साध्वी श्री ने स्पष्ट किया कि साधु-संत त्याग और तपस्या के माध्यम से कर्मों की निर्जरा करते हुए संयम पथ पर आगे बढ़ते हैं। उन्होंने साधु जीवन की शुद्धता के लिए पांच अनिवार्य आधारों (निश्रा) का उल्लेख किया, जिनमें शासन की आज्ञा, श्रावक समाज का सहयोग, संघ की निश्रा, षठजीव काय की रक्षा और शरीर का स्वास्थ्य शामिल है। साधना की कोटियों का विवेचन करते हुए उन्होंने साधुओं के चार प्रकार—स्थविर, जिनकल्पी, प्रतिमाधारी और अप्रमत साधु—के बारे में विस्तार से समझाया।

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श्रावकों का दायित्व और साधना के सोपान
प्रवचन के दौरान साध्वी श्री ने श्रावक समाज की तुलना माता-पिता, भाई और मित्र से करते हुए कहा कि एक जागरूक श्रावक ही संघ और शासन की गरिमा को अक्षुण्ण रखता है। उन्होंने श्रावकों की आध्यात्मिक प्रगति के चार स्तरों को रेखांकित किया। सुलभ बोधि श्रावक, सम्यकत्व धारी श्रावक ,व्रत धारी श्रावक, प्रतिमा धारी श्रावक

साध्वी श्री ने विशेष रूप से ‘आहार संयम’ पर बल देते हुए कहा कि एक अच्छा साधक बनने के लिए खान-पान पर नियंत्रण अनिवार्य है। उन्होंने आगाह किया कि अत्यधिक गरिष्ठ या पौष्टिक आहार साधना के मार्ग में विघ्न उत्पन्न कर सकता है, जबकि संयमित आहार सिद्धि का द्वार खोलता है।

भिक्षु भजन संध्या की तैयारियों पर चर्चा
कार्यक्रम में साध्वी श्री मंदारप्रभा जी ने भी अपने प्रेरणादायी विचार व्यक्त किए और संयम की महत्ता पर जोर दिया। सभा के अंत में तेरापंथी सभा गंगाशहर के उपाध्यक्ष पवन छाजेड़ ने आगामी ‘भिक्षु भजन संध्या’ के कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी साझा की और समाजजनों से बढ़-चढ़कर भागीदारी की अपील की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय श्रावक-श्राविकाओं ने उपस्थित होकर धर्म लाभ लिया।

 

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