श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा गंगाशहर में पर्युषण महापर्व का सातवां दिवस ‘ध्यान दिवस’ के रूप में आयोजित

श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा ने सातवां दिवस ध्यान दिवस के रूप में आयोजित
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  • नवरंगी तपस्या से धर्ममय हुआ माहौल

गंगाशहर, 14 सितम्बर । श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा, गंगाशहर के तत्वावधान में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य श्री महाश्रमण जी की विदुषी शिष्या साध्वी श्री त्रिशला कुमारी जी के पावन सानिध्य में पर्युषण महापर्व का सातवां दिवस ‘ध्यान दिवस’ के रूप में परम श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर नवरंगी तपस्या की लड़ी से पूरे गंगाशहर में धार्मिक उत्साह और उमंग का माहौल देखा गया तथा सैकड़ों श्रद्धालुओं ने तपस्या के पचखान ग्रहण किए।

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साध्वी त्रिशला कुमारी जी व साध्वीवृंद

तपस्या का मूल उद्देश्य कर्मों की निर्जरा और आत्म-कल्याण: साध्वी त्रिशला कुमारी जी
साधना और इंद्रिय संयम: सेवा केंद्र व्यवस्थापिका साध्वी श्री त्रिशला कुमारी जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि दान, शील, तप और भाव—ये मोक्ष मार्ग के चार मुख्य स्तंभ हैं। अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना ही संसार की सबसे बड़ी साधना है।

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गंगाशहर श्रावक समाज की सराहना: उन्होंने गंगाशहर को श्रद्धा और भक्ति की भूमि बताते हुए कहा कि यहां का श्रावक-श्राविका समाज कामधेनु और कल्पवृक्ष के समान निष्ठावान है, जो धर्मसंघ के हर लक्ष्य को बढ़-चढ़कर पूरा करता है।

तपस्या का वास्तविक मर्म: साध्वी श्री ने स्पष्ट किया कि तपस्या यश, कीर्ति, सांसारिक सुखों या देवलोक की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि केवल और केवल कर्मों की निर्जरा तथा आत्मा के कल्याण हेतु की जाती है। भगवान महावीर के ‘नंदन’ भव का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि 11 लाख 60 हजार मासखमण की उग्र तपस्या के प्रभाव से ही उन्हें तीर्थंकर नाम-गोत्र कर्म का बंधन हुआ था। उन्होंने सभी से तपस्या में आडंबर से बचने का आह्वान किया।

ध्यान आत्मा को परमात्मा बनाने का सशक्त माध्यम: साध्वी मल्लिका श्री जी
अंतरयात्रा और आत्म-साक्षात्कार: साध्वी श्री मल्लिका श्री जी ने ध्यान दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ध्यान की प्रक्रिया के जरिए मनुष्य अपनी आत्मा के समीप पहुंच सकता है। चंचल इंद्रियों, अहंकार और ममकार का नाश करना ही हर साधक का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।

श्वास और प्रेक्षा ध्यान: उन्होंने कहा कि दूसरों को सलाह देना आसान है, लेकिन स्वयं को जानना सबसे कठिन कार्य है। श्वास के माध्यम से श्वास को देखना, मन से मन को और चेतना से चेतना को देखना ही आत्म-दर्शन का मार्ग है। दूध में घी की तरह परमात्मा हमारी आत्मा में विद्यमान हैं, जिन्हें प्रेक्षाध्यान और कायोत्सर्ग के जरिए प्रकट किया जा सकता है।

कर्मों को भस्म करने वाली अग्नि है ध्यान: साध्वी कल्पयशा जी
जीवन रूपांतरण का साधन: साध्वी श्री कल्पयशा जी ने अपने विचारों में कहा कि ध्यान एक ऐसी पावन अग्नि है जो संचित कर्मों को जलाकर भस्म कर देती है। यह जीवन के आध्यात्मिक रूपांतरण का शाश्वत साधन है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रतिदिन दीर्घ श्वास प्रेक्षा और कायोत्सर्ग करने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम के दौरान साध्वी श्री रश्मिप्रभा जी एवं साध्वी श्री निश्चयप्रभा जी ने सुमधुर स्वर में भक्तिमय गीतिका का संगान किया, जिससे संपूर्ण सभा भवन आध्यात्मिक ऊर्जा से गुंजायमान हो उठा।

 

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