साध्वीवृंद ने गुरु महिमा, शास्त्रज्ञान और विनय का महत्व समझाया, उपाध्याय पद को बताया धर्मशिक्षा का आधार

साध्वीवृंद ने गुरु महिमा, शास्त्रज्ञान और विनय का महत्व समझाया, उपाध्याय पद को बताया धर्मशिक्षा का आधार
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नवपद ओली में उपाध्याय पद की आराधना

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बीकानेर, 21 अक्टूबर । रांगड़ी चौक स्थित पौषधशाला में तपागच्छीय गच्छाधिपति पद्मश्री आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंदसूरिश्वरजी महाराज साहेब की आज्ञानुवर्तिनी साध्वीश्री प्रीतिरत्ना, साध्वीश्री प्रीतिसुधा एवं साध्वीश्री प्रीतियशा महाराजसा आदि ठाणा-3 की पावन निश्रा में चल रही नौ दिवसीय श्री नवपद ओली आराधना के चौथे दिन बुधवार को सिद्धचक्र के चौथे पद उपाध्याय पद की आराधना की गई। इस अवसर पर साध्वीवृंद ने उपाध्याय पद की महिमा, गुरु के महत्व, शास्त्रज्ञान, विनय और शिष्य निर्माण की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जैन धर्म में उपाध्याय भगवंत ज्ञान और धर्मशिक्षा के महत्वपूर्ण आधार हैं। वे साधु-साध्वियों को आगम एवं शास्त्रों का अध्ययन कराते हैं तथा ज्ञान के साथ विनय, अनुशासन और धर्माचरण के संस्कार भी प्रदान करते हैं।

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प्रवचन में गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए समझाया गया कि गुरु जीवन के अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देने वाले होते हैं। सच्चे गुरु वही हैं, जो जीव को आत्मस्वरूप की पहचान कराते हुए आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दें। गुरु का महत्व केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे शिष्य के जीवन को सही दिशा देने और मिथ्यात्व से सम्यक्त्व की ओर बढ़ने में मार्गदर्शक बनते हैं। साध्वीवृंद ने बताया कि आचार्य भगवंत संघ के अनुशासन, संयम और संचालन के प्रमुख आधार होते हैं, जबकि उपाध्याय भगवंत शिष्यों को शास्त्रज्ञान देकर धर्मपरंपरा को आगे बढ़ाते हैं। जिस प्रकार आचार्य संघ को दिशा प्रदान करते हैं, उसी प्रकार उपाध्याय ज्ञान की परंपरा को सुरक्षित रखने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

साध्वीश्री प्रीतिसुधा महाराज सा ने उपाध्याय पद की विशेषता बताते हुए कहा कि विनय इस पद का महत्वपूर्ण गुण है। ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब उसके साथ विनम्रता और आचरण जुड़ा हो। उपाध्याय भगवंत स्वयं अध्ययन-साधना में रत रहते हुए शिष्यों को आगम, सिद्धांत और धर्म के मूल तत्वों का बोध कराते हैं। उनके मार्गदर्शन से शिष्य राग-द्वेष, मोह और मिथ्यात्व से मुक्त होने की दिशा में प्रयास करते हैं। जैन परंपरा में उपाध्याय पद की आराधना ज्ञान, विनय, स्वाध्याय और आत्मशुद्धि के प्रति समर्पण का संदेश देती है।

तपागच्छीय परंपरा में अनेक विद्वान उपाध्याय हुए हैं, जिन्होंने जैन साहित्य, दर्शन और शास्त्रों की व्याख्या के माध्यम से जिनशासन को समृद्ध किया। महोपाध्याय यशोविजयजी अपने गहन दर्शन, न्यायशास्त्र और विपुल साहित्य-सृजन के लिए प्रसिद्ध रहे। उपाध्याय विनयविजयजी भी तपागच्छीय विद्वान परंपरा से जुड़े रहे और उन्होंने शास्त्रीय साहित्य में योगदान दिया। महोपाध्याय मेघविजयजी ने काव्य, दर्शन, इतिहास और अन्य साहित्यिक विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया। इन विद्वानों की परंपरा यह बताती है कि उपाध्याय पद केवल शिक्षण का दायित्व नहीं, बल्कि शास्त्रज्ञान के संरक्षण, अध्ययन और प्रसार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है। पदम प्रभु ट्रस्ट के अजय बैद ने बताया कि श्रीसकल संघ की पूजा का लाभ लेते हुए ताराचंद-खेमचंद परिवार की ओर से इलायची की प्रभावना की गई।

साध्वीश्री प्रीतिसुधा व प्रितियशा महाराज सा ने श्रावक-श्राविकाओं को धर्मप्रवचनों का अधिकाधिक लाभ लेने, नियमित स्वाध्याय करने और गुरुजनों से प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब श्रवण के साथ मनन और आचरण भी जुड़ें। नवपद ओली के नौ दिनों में सिद्धचक्र के नौ पदों की क्रमशः आराधना के माध्यम से श्रद्धालु ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप के महत्व को समझते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ते हैं।

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