बीकानेर के रेतीले धोरों पर छाई राजस्थानी लोक संस्कृति की अनूठी छटा
बीकानेर के रेतीले धोरों पर छाई राजस्थानी लोक संस्कृति की अनूठी छटा

- मांड़ गायकी पर झूमे देशभर से आए चिकित्सक
बीकानेर, 23 अक्टूबर । ‘पधारो म्हारे देश’ की आत्मीय परंपरा को जीवंत करते हुए मरुधरा की सांस्कृतिक नगरी बीकानेर ने एक बार फिर अपनी मेहमाननवाजी और समृद्ध लोककलाओं से देश के कोने-कोने से पहुंचे मेहमानों का दिल जीत लिया है। भारतीय चर्म, रति एवं कुष्ठ रोग विशेषज्ञ संगठन के 47वें राज्य स्तरीय दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेने बीकानेर पहुँचे 450 से अधिक चिकित्सकों और उनके परिजनों के लिए शुक्रवार की शाम बेहद यादगार बन गई। शहर के रमणीय रेतीले धोरों पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या में जब प्रसिद्ध लोक कलाकार अली गनी ने पारंपरिक राजस्थानी मांड़ गायकी की स्वर लहरियां बिखेरीं, तो चिकित्सक और उनके परिजन भी थिरकने को मजबूर हो गए।


मांड़ गायकी और लोकनृत्य ने बांधा समां



रेत के टीलों के बीच सजी इस शाम में राजस्थानी लोक संगीत की सुमधुर धुनों ने रेगिस्तानी संस्कृति का अनूठा अहसास कराया। लोक कलाकार अली गनी की प्रस्तुतियों ने राजस्थान की मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन की सरलता और परंपराओं को जीवंत कर दिया। देश के विभिन्न राज्यों से आए मेहमानों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया और पारंपरिक लोकनृत्यों के बीच इस सांस्कृतिक उत्सव का भरपूर आनंद लिया। पहली बार बीकानेर आए चिकित्सकों के लिए यह अनुभव बेहद रोमांचक और सुखद रहा।
मेहमाननवाजी में बीकानेर के चिकित्सकों ने नहीं छोड़ी कोई कसर
बाहर से आए अतिथियों के स्वागत और उन्हें राजस्थानी संस्कृति से रूबरू कराने में स्थानीय चिकित्सकों ने सक्रिय भूमिका निभाई। इस दौरान डॉ. राजेश दत्त मेहता, डॉ. बी.सी. घिया, डॉ. मोहित बंसल, डॉ. प्रसून सोनी, डॉ. सौरभ अग्रवाल, डॉ. दीपिका सिंह और डॉ. राधेश्याम सहित अन्य चिकित्सकों ने आतिथ्य सत्कार में कोई कमी नहीं छोड़ी।
चिकित्सा विज्ञान के गंभीर सत्रों के साथ-साथ आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या ने यह सिद्ध कर दिया कि बीकानेर की असली पहचान केवल इसके ऐतिहासिक किलों और महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ के लोकगीत, संगीत और आत्मीय अतिथि सत्कार भी इसकी अनूठी थाती हैं। धोरों पर बीता यह पल सभी मेहमानों के लिए आजीवन स्मरणीय बन गया।

