मानवता की मिसाल: 10 महीने की आलिन ने जाते-जाते पाँच लोगों को दी नई जिंदगी, बनीं केरल की सबसे कम उम्र की अंगदाता
पाँच फ़रवरी को कोट्टायम-तिरुवल्ला रोड पर आलिन एक सड़क दुर्घटना में ज़ख़्मी हो गई थीं


तिरुवनंतपुरम/पथानामथिट्टा, 18 फ़रवरी । केरल से एक ऐसी भावुक कर देने वाली खबर सामने आई है, जिसने अंगदान के प्रति पूरे देश के नजरिए को बदल कर रख दिया है। मात्र 10 महीने की नन्हीं आलिन शेरिन अब्राहम ने अपनी मृत्यु के बाद पाँच लोगों को जीवनदान दिया है। एक दुखद कार दुर्घटना में ‘ब्रेन डेड’ घोषित होने के बाद आलिन के माता-पिता ने जो हौसला दिखाया, उसने उसे राज्य की सबसे कम उम्र की अंगदाता बना दिया।


रविवार को पथानामथिट्टा में नन्हीं आलिन को राजकीय सम्मान (State Funeral) के साथ अंतिम विदाई दी गई। इस मौके पर केरल सरकार के मंत्रियों और आम जनता ने नम आंखों से इस ‘नन्हीं फरिश्ते’ को श्रद्धांजलि दी।


एक पिता का संकल्प और मां की सहमति
आलिन के पिता अरुण अब्राहम ने बताया कि उनके इस कठिन फैसले के पीछे साल 2013 की एक पुरानी याद थी। कॉलेज के दिनों में उन्होंने किडनी फाउंडेशन के फादर डेविस का अंगदान पर एक व्याख्यान सुना था, जिससे प्रेरित होकर उन्होंने उसी दिन अंगदान का संकल्प ले लिया था।
“जब डॉक्टरों ने आलिन को ब्रेन डेड बताया, तो हमारे पैर तले जमीन खिसक गई। लेकिन जब मैंने पत्नी शेरिन से अंगदान की बात पूछी, तो उन्होंने बिना देर किए तुरंत सहमति दे दी। हम चाहते थे कि हमारी बेटी किसी और के रूप में जीवित रहे।” — अरुण अब्राहम
पाँच चेहरों पर लौटी मुस्कान: किसे क्या मिला?
आलिन के अंगों को ग्रीन कॉरिडोर के जरिए विभिन्न अस्पतालों में पहुंचाया गया, जिससे कई गंभीर बीमार बच्चों को नया जीवन मिला:
लीवर: 6 महीने की नन्हीं ध्रिया को लीवर प्रत्यारोपित किया गया, जो जन्म के एक महीने बाद ही लीवर फेल्योर से जूझ रही थी। ध्रिया के पिता एक खदान मजदूर हैं और उनके पास इलाज के लिए संसाधन सीमित थे।
किडनी: एक किडनी तिरुवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज में 10 वर्षीय बच्चे को दी गई।
अन्य अंग: दूसरी किडनी, हार्ट वॉल्व और आँखों को कोच्चि व तिरुवनंतपुरम के जरूरतमंद मरीजों से मैच कराने की प्रक्रिया पूरी की गई।
मेडिकल क्षेत्र के लिए प्रेरणादायक उदाहरण
श्री चित्रा तिरुनाल इंस्टीट्यूट के न्यूरोसर्जरी प्रोफेसर डॉ. ईश्वर एच.वी. ने इस कदम को अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि वयस्कों के मुकाबले शिशुओं को ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया जटिल होती है (एक साल से कम उम्र के बच्चों में इसमें लगभग 12 घंटे लगते हैं), लेकिन परिवार के सहयोग से यह संभव हो सका।
यह भी एक सुखद संयोग रहा कि डॉ. ईश्वर की 91 वर्षीय मां आनंदवल्ली अम्माल ने भी हाल ही में त्वचा और कॉर्निया दान कर मिसाल पेश की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि आलिन जैसी नन्हीं जान की कुर्बानी समाज में अंगदान के प्रति व्याप्त झिझक को दूर करेगी।
