राजस्थान में बस हड़ताल- यात्रियों की बढ़ेगी मुसीबत
आज आधी रात से थमेंगे निजी बसों के पहिए


- आज आधी रात से थमेंगे निजी बसों के पहिए; 15 लाख
जयपुर/जोधपुर, 22 फरवरी। राजस्थान में निजी बस संचालकों और परिवहन विभाग के बीच जारी तनातनी ने अब एक बड़े संकट का रूप ले लिया है। अपनी मांगों को लेकर अड़े बस ऑपरेटर्स ने सोमवार (23 फरवरी) रात 12 बजे से पूरे प्रदेश में अनिश्चितकालीन ‘चक्काजाम’ का ऐलान किया है। इस हड़ताल का असर न केवल राजस्थान, बल्कि पड़ोसी राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से आने-जाने वाली बसों पर भी पड़ेगा। परिवहन नियमों और विभाग की हालिया कार्रवाई के विरोध में शुरू हो रही इस हड़ताल से आम जनता की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।


टिकट बुकिंग बंद, 40 हजार बसें नहीं चलेंगी
हड़ताल की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संचालकों ने 23 से 28 फरवरी तक की सभी ऑनलाइन टिकट बुकिंग पहले ही बंद कर दी हैं।


बसों का आंकड़ा: राज्य के कॉन्ट्रैक्ट और स्टेज कैरिज ऑपरेटर्स के अनुसार, करीब 30 हजार लोक परिवहन बसें और 10 हजार स्लीपर कोच सड़कों से नदारद रहेंगे।
यात्री भार: इस चक्काजाम से प्रतिदिन सफर करने वाले लगभग 15 लाख यात्री सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। विशेषकर लंबी दूरी के यात्रियों के लिए यह रात किसी दुस्वप्न से कम नहीं होगी।
क्यों नाराज हैं बस संचालक?
ऑल राजस्थान कॉन्ट्रैक्ट कैरिज बस ऑपरेटर एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेन्द्र शर्मा और एसोसिएशन अध्यक्ष सत्यनारायण साहू ने हड़ताल के मुख्य कारण स्पष्ट किए हैं:
भारी जुर्माना: संचालकों का आरोप है कि विभाग नए मोटर व्हीकल एक्ट के कड़े प्रावधान पुरानी बसों पर भी थोप रहा है, जिससे उन पर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा रहा है।
यात्रियों की परेशानी: विभाग की कार्रवाई के दौरान बसों को सीज कर यात्रियों को बीच रास्ते में उतार दिया जाता है, जिससे संचालकों की छवि खराब हो रही है।
बॉर्डर जाम की चेतावनी: संचालकों ने चेतावनी दी है कि वे केवल बसें खड़ी ही नहीं करेंगे, बल्कि दूसरे राज्यों की सीमाओं पर मार्ग भी जाम करेंगे।
रोडवेज के भरोसे जनता, सरकार की चुप्पी
हड़ताल की इतनी बड़ी चेतावनी के बावजूद, शासन और प्रशासन की ओर से अब तक यात्रियों के लिए किसी वैकल्पिक व्यवस्था की घोषणा नहीं की गई है।
सीमित संसाधन: राजस्थान रोडवेज के पास वर्तमान में केवल 3 हजार बसें हैं, जो 15 लाख निजी बस यात्रियों के भार को संभालने के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं।
वार्ता का अभाव: अब तक सरकार और बस ऑपरेटर्स के बीच सुलह के लिए कोई औपचारिक वार्ता शुरू नहीं हुई है, जिससे अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
