राजस्थान हाईकोर्ट की मुहर, नई जनगणना बिना वार्ड परिसीमन मान्य:नोखा नगरपालिका के वार्ड पुनर्गठन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
राजस्थान हाईकोर्ट की मुहर, नई जनगणना बिना वार्ड परिसीमन मान्य:नोखा नगरपालिका के वार्ड पुनर्गठन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज


जोधपुर, 10 मार्च। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने नगर पालिका चुनावों से जुड़े वार्ड परिसीमन मामले में एक बड़ा ‘रिपोर्टेबल’ फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राजस्थान नगर पालिका अधिनियम, 2009 की धारा 10 के तहत वार्डों की भौगोलिक सीमा तय करने के लिए नई जनगणना का होना अनिवार्य शर्त नहीं है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने बीकानेर के नोखा नगरपालिका के वार्ड पुनर्गठन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है।


दरअसल, यह याचिका बीकानेर के नोखा की राजनीतिक पार्टी ‘विकास मंच’ के अध्यक्ष ललित किशोर झंवर और कांकरिया चौक, नोखा निवासी सुखाराम भादू ने दायर की थी। इसमें इन्होंने बताया कि नोखा नगर पालिका का गठन 1952 में हुआ था और शुरुआत में इसमें 35 वार्ड थे। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2019-2020 में परिसीमन कर वार्डों की संख्या बढ़ाकर 45 की गई थी, जिसके आधार पर वर्ष 2021 में चुनाव हुए थे।


वार्ड पुनर्गठन के दिशा-निर्देश और पूर्व की कानूनी लड़ाई
राज्य सरकार ने 13 फरवरी 2025 को वार्ड पुनर्गठन के नए दिशा-निर्देश और 27 मार्च 2025 को एक अनुसूची जारी की। इसके बाद 1 सितंबर 2025 को नई अधिसूचना जारी की गई, जो 15 सितंबर को राजपत्र में प्रकाशित हुई। याचिकाकर्ताओं ने इससे पहले एक रिट याचिका भी दायर की थी, जिसे कोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को निर्णीत किया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने 20 दिसंबर 2025 को सक्षम प्राधिकारी को एक रिपोर्ट दी, लेकिन कोई राहत नहीं मिलने पर यह नई याचिका खंडपीठ में पेश की गई।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों के प्रमुख तर्क
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि बिना नई जनगणना के परिसीमन करना पूरी तरह से मनमाना है। वकील ने तर्क दिया कि नया परिसीमन अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और महिलाओं के आरक्षण मैट्रिक्स (जनसंख्या अनुपात) तथा रोटेशन तंत्र का सीधा उल्लंघन है।
अदालती हस्तक्षेप पर रोक के सवाल पर वकील ने ‘राजेश कुमार शर्मा बनाम पंजाब राज्य’ और सुप्रीम कोर्ट के ‘केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख बनाम जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस’ मामलों का हवाला दिया। वकील ने तर्क दिया कि चुनाव अधिसूचना जारी होने से पहले संविधान के अनुच्छेद 243ZG की बाधा पूर्ण नहीं है, इसलिए कोर्ट हस्तक्षेप कर सकती है। साथ ही ‘शीला कुमारी’ फैसले का भी संदर्भ दिया गया।
राज्य सरकार के तर्क और पेश दृष्टांत
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता व अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश पंवार ने याचिका पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि अनुच्छेद 243ZG के तहत ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर स्पष्ट संवैधानिक रोक है।
पंवार ने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 6 (वार्डों की संख्या तय करना) और धारा 10 (भौगोलिक सीमांकन) बिल्कुल अलग-अलग हैं और 22 नवंबर 2024 को धारा 6 के तहत जारी मूल अधिसूचना को कभी चुनौती नहीं दी गई, जो अब अंतिम हो चुकी है।
एएजी ने अपने तर्कों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के ‘नाथी देवी बनाम राधा देवी गुप्ता’ और ‘पद्मा सुंदरा राव बनाम तमिलनाडु राज्य’ के साथ-साथ ‘गुड्डी बनाम राजस्थान राज्य’ के फैसलों का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट: चुनाव प्रक्रिया और परिसीमन में हस्तक्षेप नहीं
कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि संविधान का अनुच्छेद 243ZG चुनाव प्रक्रिया और परिसीमन में न्यायिक हस्तक्षेप को रोकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की वैधानिक योजना दो अलग-अलग प्रक्रियाओं पर विचार करती है; पहला धारा 6 के तहत वार्डों की संख्या और संरचना का निर्धारण, और दूसरा धारा 10 के तहत उन वार्डों का क्षेत्रीय सीमांकन और आंतरिक संरचना।
कोर्ट ने पाया कि धारा 10 के तहत वार्डों के क्षेत्रीय सीमांकन के लिए नई जनगणना का इंतजार करना या उस पर निर्भर रहना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के ‘शीला कुमारी’ फैसले को इस मामले में लागू करने से इनकार कर दिया। किसी भी प्रकार के अधिकार क्षेत्र या संवैधानिक उल्लंघन के अभाव में कोर्ट ने बिना कोई राहत दिए रिट याचिका को खारिज कर दिया।
