बिस्सों के चौक में गूंजी ‘भक्त पूर्णमल’ की टेर, श्रद्धा और संस्कृति के संगम में रात भर जागा बीकानेर
बिस्सों के चौक में गूंजी 'भक्त पूर्णमल' की टेर, श्रद्धा और संस्कृति के संगम में रात भर जागा बीकानेर


बीकानेर, 27 फरवरी। छोटी काशी की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप गुरुवार रात बिस्सों के चौक में देखने को मिला। देवी आशापुरा नाट्य एवं कला संस्थान द्वारा आयोजित उस्ताद रमणसा बिस्सा की प्रसिद्ध ’’भक्त पूर्णमल’’ रम्मत का मंचन गुरुवार रात से शुरू होकर शुक्रवार सुबह तक चला। कड़ाके की ठंड के बावजूद सैकड़ों दर्शकों ने रात भर जागकर इस पौराणिक लोकनाट्य के संवादों, गीतों और कटाक्षों का आनंद लिया।


आशापुरा के जयकारों से हुआ मंच का अवतरण
रम्मत का आगाज देवी आशापुरा के मंच अवतरण के साथ हुआ। जब चौक में “करो आशापुरा आनंद शहर बीकाणे में” की स्तुति गूंजी, तो पूरा माहौल भक्तिमय हो गया।


पूर्वजों का स्मरण: रम्मत की शुरुआत में गणपति वंदना के साथ बिस्सा परिवार के तपस्वी जागनाथ जी बिस्सा, हीरालाल व्यास और उस्ताद रमणसा बिस्सा का भावपूर्ण स्मरण किया गया।
भक्ति रचनाएं: महादेव की विशेष स्तुति “गागड़ दी गंग सोहे शीश पे…” ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कथानक: वासना पर भारी पड़ी पितृ-भक्ति और संयम
रम्मत के उस्ताद कृष्ण कुमार बिस्सा ने बताया कि इस लोकनाट्य का कथानक कामदेव, ब्रह्मचर्य और नारी चरित्र के विविध पहलुओं को उजागर करता है।
कहानी का सार: सियालकोट के वृद्ध राजा शंखपति की नवविवाहिता पत्नी फूलन दे, अपने सौतेले पुत्र पूर्णमल पर आसक्त हो जाती है। जब पूर्णमल यह कहकर उसे ठुकरा देता है कि— “तू माता मैं पुत्र हूं, सोच समझे मन माही…”, तो फूलन दे प्रतिशोध में आकर उन पर झूठा आरोप लगा देती है।
सुखद अंत: राजा द्वारा दी गई फांसी के बाद, गुरु गोरखनाथ और ओघड़ नाथ अपनी सिद्धियों से पूर्णमल को पुनर्जीवित कर देते हैं, जिससे यह दुःखद कहानी एक आध्यात्मिक सुखान्तिका में बदल जाती है।
जोशी-जोशण और खाखी का आकर्षण
रम्मत में पात्रों के चयन और प्रदर्शन ने सबका दिल जीत लिया:
खाखी की धूम: खाखी के पात्र ने “कपड़ा धोवे साबू से” की धुन पर अखाड़े को बुरी नजर से बचाने के लिए करतब दिखाए।
जोशी-जोशण: इन पात्रों ने संवादों के माध्यम से समाज को अच्छे जमाने का संदेश दिया।
मुख्य कलाकार: विशाल पुरोहित (देवी स्वरूप), कृष्ण कुमार बिस्सा (पूर्णमल), गोविंद गोपाल (शंखपति) और मनोज कुमार व्यास (फूलन दे) ने अपने जीवंत अभिनय से समां बांध दिया।
टेर बिना रम्मत ढेर: गायकों का योगदान
रम्मत की सफलता इसके ‘टेर’ (संवादों को सुर देने वाले सह-गायक) पर निर्भर करती है। इंद्र कुमार बिस्सा के हारमोनियम वादन और मनीष व्यास के नगाड़े की थाप पर रामकुमार बिस्सा, बल्लूजी और युवा कलाकारों की टोली ने सुबह 10:15 बजे तक सुर से सुर मिलाया। समापन पर सभी कलाकारों ने देवी आशापुरा की देवळी में नतमस्तक होकर शहर की सुख-समृद्धि की कामना की।
