राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र में राजभाषा कार्यशाला आयोजित, ‘हिंदी में कार्य: चुनौती नहीं, अवसर है’

राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र में राजभाषा कार्यशाला आयोजित
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quicjZaps 15 sept 2025
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बीकानेर, 25 जून, 2025: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (ICAR-NRCC), बीकानेर में आज ‘हिंदी में कार्य: चुनौती नहीं, अवसर है’ विषय पर एक राजभाषा कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का उद्देश्य हिंदी भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना और इसके महत्व को रेखांकित करना था।

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कार्यशाला के मुख्य अतिथि और वक्ता डॉ. नमामी शंकर आचार्य, सहायक आचार्य, बेसिक पी.जी. महाविद्यालय, बीकानेर, ने अपने व्याख्यान में कहा कि शिक्षा पद्धति में हिंदी को उचित महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि वैश्विक व्यापार, मनोरंजन उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अनुवाद जैसे कई क्षेत्रों में हिंदी के माध्यम से अपार अवसर प्राप्त किए जा सकते हैं। डॉ. आचार्य ने यह भी उल्लेख किया कि नई शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य भी इसी दिशा में अग्रसर होना है। उन्होंने निज भाषा पर गर्व करने, राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने, और नई शिक्षा नीति के विविध पहलुओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।

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इस अवसर पर केंद्र के निदेशक एवं कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा के स्थान पर किसी अन्य भाषा का प्रयोग करता है, तो वह वास्तविक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मानसिक अनुवाद होता है। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा में व्यक्ति सहज, स्वाभाविक और प्रभावशाली रूप से स्वयं को अभिव्यक्त करता है। डॉ. पूनिया ने इस अनुभव को आधार बनाते हुए हिंदी भाषा को गौरव के साथ अपनाने का आग्रह किया, जैसा कि चीन, फ्रांस, जापान और जर्मनी जैसे विकसित राष्ट्रों में देखा जा सकता है, जहाँ वे अपनी भाषा में ही शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और शासन के समस्त कार्य सम्पन्न करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी को सशक्त कार्य-भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए अभी बहुत अधिक कार्य किए जाने की आवश्यकता है, जिसमें विषय-विशेषज्ञों के समन्वय और सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

केंद्र के राजभाषा नोडल अधिकारी डॉ. राकेश रंजन ने राजभाषा कार्यशाला के उद्देश्य एवं महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी में कार्य करना न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करता है, बल्कि यह प्रशासन, ज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर भी एक सशक्त कदम है। कार्यक्रम की रूपरेखा डॉ. राकेश कुमार पूनियां द्वारा तैयार की गई और इसका संचालन नेमीचंद बारासा ने किया।

 

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