एमजीएसयू में भ्रष्टाचार की परतें खुलीं

राजस्थान के राजयपाल से मांग कुलपतियों के भ्र्ष्ट आचरण की गहनता से जांच हो
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quicjZaps 15 sept 2025
  • गेस्ट फेकल्टी नियुक्ति से लेकर डिग्री–प्रश्नपत्र छपाई तक घोटालों के आरोप
  • 20 बिंदुओं में कुलगुरु की शिकायत, राजभवन का पत्र दबाने का सनसनीखेज आरोप

बीकानेर, 25 जनवरी। महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय (MGSU) में प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय के कुलगुरु (Vice Chancellor) के खिलाफ 20 बिंदुओं की एक विस्तृत शिकायत राजभवन (राज्यपाल सचिवालय) तक पहुँची है। सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि राजभवन द्वारा इस मामले में मांगी गई ‘फैक्चुअल रिपोर्ट’ (तथ्यात्मक रिपोर्ट) के पत्र को विश्वविद्यालय प्रशासन ने कथित तौर पर दबा दिया और समय पर जवाब नहीं भेजा।

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महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय (एमजीएसयू) में भ्रष्टाचार अब केवल आरोप नहीं, बल्कि एक संगठित व्यवस्था का रूप लेता दिख रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन पर गेस्ट फेकल्टी नियुक्ति , सरकारी वाहनों के खुले दुरुपयोग, प्रश्नपत्रों और डिग्रियों की छपाई जैसे संवेदनशील मामलों में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि राजभवन द्वारा मांगी गई फैक्चुअल रिपोर्ट से जुड़ा पत्र कथित तौर पर दबा दिया गया।

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20 बिंदुओं में कुलगुरु की शिकायत: सिस्टम पर सीधा हमला

सूत्रों के अनुसार कुलगुरु की ओर से दी गई 20 बिंदुओं की शिकायत विश्वविद्यालय में व्याप्त कथित भ्रष्ट तंत्र की ओर इशारा करती है। शिकायत में आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर नियुक्तियां की गईं, चयन समितियों की प्रक्रिया संदिग्ध रही और योग्य अभ्यर्थियों को दरकिनार कर पसंदीदा लोगों को लाभ पहुंचाया गया।

सरकारी वाहन निजी सेवा में

शिकायत में यह भी उल्लेख है कि विश्वविद्यालय के सरकारी वाहन निजी कार्यों, व्यक्तिगत यात्राओं और गैर-आधिकारिक उपयोग में लिए गए। ईंधन खर्च और लॉगबुक की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालय की संपत्ति अब निजी सुविधा बन चुकी है?

प्रश्नपत्र और डिग्री छपाई में खेल !
खोजी बिंदुओं में यह भी सामने आया है कि प्रश्नपत्रों और डिग्रियों की छपाई में तय नियमों की अनदेखी की गई। आरोप है कि बिना पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया के चुनिंदा एजेंसियों को काम सौंपा गया, अधिक दरों पर भुगतान किया गया और गुणवत्ता से समझौता किया गया। यह सीधे तौर पर परीक्षा प्रणाली और विश्वविद्यालय की साख से खिलवाड़ माना जा रहा है।

एसीबी (ACB) की कार्रवाई से जुड़े तार
हाल ही में एसीबी द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में परीक्षा भवन से 7 लाख रुपये की नकदी बरामद करने और एक निजी फर्म के प्रतिनिधि को हिरासत में लेने की घटना को भी इन्हीं शिकायतों से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि परीक्षा टेंडर और भुगतान की प्रक्रिया में चल रहे इसी ‘कमीशन खेल’ की शिकायतें राजभवन तक पहुँची हैं।

विश्वविद्यालय में असंतोष का माहौल
विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक स्टाफ में भी इस स्थिति को लेकर भारी असंतोष है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि भ्रष्टाचार के इन आरोपों के कारण विश्वविद्यालय की छवि धूमिल हो रही है और सामान्य कामकाज प्रभावित हो रहा है। यदि राजभवन की रिपोर्ट पर जल्द उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो छात्र संगठन और शिक्षक संघ आंदोलन की राह पकड़ सकते हैं।

राजभवन का पत्र और एमजीएसयू की चुप्पी
सूत्रों के अनुसार, राजभवन ने इन शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव (Registrar) से एक विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी थी। नियमानुसार, ऐसे पत्रों का जवाब एक निश्चित समयावधि में देना होता है। आरोप है कि कुलगुरु कार्यालय के प्रभाव में इस पत्र को फाइलों में दबा दिया गया, ताकि राजभवन तक वास्तविक स्थिति न पहुँच सके। इस ‘चुप्पी’ ने अब कुलगुरु की कार्यप्रणाली पर और भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजभवन ने मांगी रिपोर्ट, लेकिन पत्र दबा!

मामले की गंभीरता को देखते हुए राजभवन ने एमजीएसयू से फैक्चुअल रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि यह पत्र विश्वविद्यालय प्रशासन ने लंबे समय तक दबाकर रखा।
सवाल यह उठता है कि

  •  क्या जानबूझकर जांच से बचने की कोशिश की गई?
  •  क्या किसी को संरक्षण देने के लिए पत्र को नजरअंदाज किया गया?

चुप्पी क्यों?

यदि आरोप निराधार हैं तो रिपोर्ट भेजने में देरी क्यों? और यदि आरोप सही हैं, तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि ऐसे गंभीर मामलों पर भी पर्दा डाला जाएगा, तो विश्वविद्यालय शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाएगा।

उच्चस्तरीय जांच की मांग
अब मांग उठ रही है कि इस पूरे मामले की राजभवन या स्वतंत्र एजेंसी से उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही यह भी जांच हो कि राजभवन का पत्र दबाने की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी।

अतिरिक्त संम्भागीय आयुक्त मौन क्यों ?

अतिरिक्त संम्भागीय आयुक्त जिनके पास विश्वविद्यालय के कुलसचिव का अतिरिक्त चार्ज है उन्हें सरकार का प्रतिनिधि होने के नाते शिकायत के विभिन्न बिंदुओं का पूर्ण अध्ययन कर तथ्यों की पूरी जानकारी सरकार का प्रतिनिधि होने के नाते शिकायत के विभिन्न बिंदुओं का पूर्ण अध्ययन कर तथ्यों की पूरी जानकारी प्राप्त कर सरकार को निष्पक्ष रिपोर्ट देनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार और अपव्यय पर तत्काल अंकुश लग सके।

राजभवन की भूमिका पर सबकी नजर
फिलहाल पूरे शैक्षणिक जगत की निगाहें राजभवन पर टिकी हैं। देखना यह है कि क्या प्रदेश की भाजपा सरकार व महाराष्ट्रा से आये राज्यपाल राजस्थान के विश्वविधालयों में चल रहे भ्र्ष्टाचार के खुलमखुला खेल व लूंट को रोक पाएंगे ?
यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि बड़े शैक्षणिक भ्रष्टाचार घोटाले के रूप में सामने आ सकता है।

थार एक्सप्रेस ने इस मामले को उजागर किया था जिसको लिंक पर पढ़ा जा सकता है। ……….

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