58 साल का साथ और 46 साल की बेदाग शादी, राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा— “बुढ़ापे में तलाक समाधान नहीं, रिश्तों की गरिमा ज़रूरी”

58 साल का साथ और 46 साल की बेदाग शादी
shreecreates
quicjZaps 15 sept 2025

जयपुर, 17 फरवरी। राजस्थान हाई कोर्ट ने वैवाहिक संबंधों और पारिवारिक मूल्यों को लेकर एक ऐतिहासिक और भावनात्मक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक ऐसे बुजुर्ग दंपती की तलाक याचिका को खारिज कर दिया, जिनकी शादी को 58 साल हो चुके थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे वैवाहिक जीवन के बाद छोटी-मोटी बहस, संपत्ति के झगड़े या मनमुटाव को ‘क्रूरता’ की श्रेणी में रखकर पवित्र बंधन को तोड़ा नहीं जा सकता।

indication
L.C.Baid Childrens Hospiatl

यह मामला वर्ष 1967 में विवाह सूत्र में बंधे एक दंपती का है, जिन्होंने 2013 तक (लगभग 46 वर्ष) सुखद जीवन बिताया। विवाद की शुरुआत तब हुई जब बच्चों के बड़े होने पर संपत्ति के बंटवारे और पारिवारिक प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद गहरे हो गए। पति ने वर्ष 2014 में भरतपुर फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी, जिसे वहां खारिज किए जाने के बाद मामला हाई कोर्ट पहुँचा।

pop ronak

आरोप-प्रत्यारोप: दहेज की FIR से लेकर अवैध संबंधों के दावे तक
अदालती कार्यवाही के दौरान पति-पत्नी ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए, जिन्हें कोर्ट ने बुढ़ापे की असुरक्षा और वैचारिक मतभेद माना।

पति का तर्क: पत्नी ने झूठी दहेज FIR दर्ज कराई जिससे सामाजिक बेइज्जती हुई। वह संपत्ति केवल बड़े बेटे को देना चाहती है, जबकि मैं बराबर हिस्सा चाहता हूँ। साथ ही, पत्नी मुझ पर अवैध संबंधों के झूठे लांछन लगाती है।

पत्नी का तर्क: पति परिवार की संपत्ति को बर्बाद कर रहे हैं। उनके किसी अन्य महिला से संबंध हैं और वे अपने छोटे भाई के बहकावे में आकर इस उम्र में घर तोड़ना चाहते हैं।

हाई कोर्ट की टिप्पणी: “मानसिक सहनशीलता और सामाजिक गरिमा सर्वोपरि”
जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमान की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता और दंपती की उम्र को देखते हुए तलाक देने से इनकार कर दिया। बेंच ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  • सामान्य उतार-चढ़ाव: शादीशुदा जिंदगी में असहमति होना सामान्य है, इसे कानूनी ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता।
  • रिश्ते की उम्र: 58 साल साथ रहने के बाद मानसिक सहनशीलता बढ़ जाती है। इस मोड़ पर रिश्ता तोड़ना पूरे परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए आत्मघाती होगा।
  • संपत्ति विवाद: संपत्ति को लेकर होने वाले झगड़े तलाक का ठोस आधार नहीं हो सकते।

निष्कर्ष: रिश्तों को जोड़ने वाला फैसला
यह फैसला समाज के लिए एक बड़ा संदेश है कि हर पारिवारिक विवाद का अंत अदालत की चौखट पर तलाक के रूप में नहीं होना चाहिए। विशेषकर बुढ़ापे में, जहाँ मानसिक और भावनात्मक सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, वहां कानूनी अलगाव जीवन को और अधिक कठिन बना सकता है। हाई कोर्ट ने इस फैसले से यह मिसाल कायम की है कि लंबे वैवाहिक जीवन का इतिहास महज कुछ सालों के तनाव से कहीं अधिक मूल्यवान है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *