बीकानेर PBM कांड पर चिकित्सा मंत्री के बयान पर भड़के कांग्रेस नेता

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  • वत्स ने कहा— “नाचती हुई आई थीं” बोलना मातृशक्ति का घोर अपमान, मांगें माफी

बीकानेर, 11 जून। पीबीएम अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की किडनी खराब होने के मामले में राजस्थान के चिकित्सा एवं बीकानेर प्रभारी मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर द्वारा मीडिया के सामने दिए गए बयान पर बवाल खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेता नितिन वत्स ने मंत्री के बयान की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे मातृशक्ति का घोर अपमान और मर्यादाहीन बताया है।

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“मातृशक्ति से तुरंत माफी मांगें मंत्री”
वत्स ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि संभाग के सबसे बड़े अस्पताल में प्रशासनिक और चिकित्सा तंत्र की लापरवाही के कारण प्रसूताएं जीवन और मौत की जंग लड़ रही हैं। ऐसे संवेदनशील समय में जांच करने आए चिकित्सा मंत्री का यह पूछना कि— “महिलाएं पैदल आई थीं या नाचते-गाते आई थीं?”— बेहद शर्मनाक और असंवेदनशील है। उन्होंने मांग की है कि प्रभारी मंत्री अपने इस ‘बेशर्म’ बयान के लिए तुरंत देश की मातृशक्ति से बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगें, अन्यथा अगली बार बीकानेर आगमन पर उनका अभूतपूर्व और जबरदस्त विरोध किया जाएगा।

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“भाजपा का मातृशक्ति वंदन सिर्फ एक ढकोसला”
वत्स ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की मानसिकता हमेशा से पुरुष प्रधान विकृति वाली रही है, जहां महिलाओं के सम्मान के लिए कोई वास्तविक जगह नहीं है। उन्होंने कहा जो महिला अपनी कोख से एक नए जीवन को जन्म देती है, शास्त्रों और समाज में उसे देवतुल्य माना गया है।

ऐसी गंभीर स्थिति में तड़प रही माताओं के बारे में ऐसा ओछा बयान देना यह साबित करता है कि भाजपा का ‘मातृशक्ति वंदन अभियान’ सिर्फ एक चुनावी ढकोसला है।

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प्रसव कोई ‘बीमारी’ नहीं, अस्पताल की ‘आपराधिक लापरवाही’ है
इस पूरे घटनाक्रम पर विचार करें तो प्रसव कोई बीमारी नहीं है। अस्पताल में भर्ती होने वाली महिलाएं किसी पुरानी लाइलाज बीमारी के साथ नहीं आई थीं, बल्कि एक स्वस्थ शिशु को जन्म देने आई थीं। सी-सेक्शन (C-Section) जैसी सर्जिकल प्रक्रिया के बाद यदि एक साथ कई महिलाओं की किडनियां फेल हो रही हैं, तो यह सीधे तौर पर ऑपरेशन थिएटर (OT) के संक्रमण, दूषित दवाओं या चिकित्सा उपकरणों के रख-रखाव में बरती गई आपराधिक लापरवाही (Criminal Negligence) की ओर इशारा करता है। अपनी विफलता को छुपाने के लिए पीड़ितों को ही कसूरवार ठहराना किसी भी जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति को शोभा नहीं देता।

संवेदनाहीनता की पराकाष्ठा
“क्या वे नाचती हुई आई थीं?” जैसे शब्दों में छिपी क्रूरता उन गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के सीने में खंजर की तरह उतरती है, जो अपनी बेटियों-बहनों को खुशी की उम्मीद में सरकारी अस्पताल लाते हैं। जब एक नवजात शिशु की माँ डायलिसिस मशीनों और वेंटिलेटर के बीच जिंदगी की भीख मांग रही हो, तब राज्य के स्वास्थ्य मुखिया का पत्रकारों के तीखे सवालों से झल्लाकर कुतर्क करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को शर्मसार करता है।

सिर्फ माफी नहीं, अब न्याय की दरकार
लोकतंत्र में ऐसी निरंकुशता और अमानवीयता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इस मामले में अब केवल एक माफी काफी नहीं है, बल्कि पीड़ित प्रसूताओं को सरकार के खर्च पर देश का सर्वोत्तम इलाज मुहैया कराया जाए। प्रभावित परिवारों को उचित आर्थिक मुआवजा दिया जाए। जोधपुर से आई उच्च स्तरीय जांच टीम की रिपोर्ट के आधार पर दोषी डॉक्टरों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित हो।

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