त्रिभाषा काव्य गोष्ठी में बिखरे हिंदी, उर्दू व राजस्थानी भाषाओं के विविध रंग
त्रिभाषा काव्य गोष्ठी में बिखरे हिंदी, उर्दू व राजस्थानी भाषाओं के विविध रंग



- प्रोफेसर डॉ. नरसिंह बिनानी बोले— ‘भाषा ही साहित्य और समाज का आधार’
बीकानेर , 20 सितम्बर । पर्यटन लेखक संघ एवं महफिले-अदब के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को गंगाशहर रोड स्थित होटल मरुधर हेरिटेज में साप्ताहिक त्रिभाषा काव्य गोष्ठी का गरिमामय आयोजन संपन्न हुआ। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद्, चिंतक एवं लेखक प्रोफेसर डॉ. नरसिंह बिनानी ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध शायर इमदाद उल्लाह बासित उपस्थित रहे।


भाषा पाठक और रचनाकार के मध्य सेतु का कार्य करती है: डॉ. बिनानी
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर डॉ. नरसिंह बिनानी ने कहा कि भाषा के बिना किसी भी साहित्य की कल्पना असंभव है। साहित्यकार केवल रचनाकार नहीं, बल्कि भाषाओं को समृद्ध कर देश व समाज की एकता को सुदृढ़ करने वाला होता है। उन्होंने त्रिभाषा (हिंदी, उर्दू व राजस्थानी) काव्य गोष्ठी के आयोजन को कौमी एकता का प्रेरक उदाहरण बताया।


इस अवसर पर डॉ. बिनानी ने सामाजिक समरसता का संदेश देती अपनी काव्य पंक्तियां प्रस्तुत कीं:
“सबको यही संदेश देना, प्रेम-प्रीत बनाए रखना,
बनाए सप्तरंगों से मांडना, उसमें कमी मत छोड़ना।”
हिंदी, उर्दू और राजस्थानी के वरिष्ठ रचनाकारों ने बांधा समां
मुख्य अतिथि की प्रस्तुति: मुख्य अतिथि शायर इमदाद उल्लाह बासित ने अपनी मधुर गज़ल— “तेरे दीदार की ख्वाहिश लिए दीवाना तेरा, दश्तो सहरा में भटकता है ये मस्ताना तेरा।” पेश कर वाहवाही लूटी।
14 वर्षों की साहित्यिक यात्रा: प्रारंभ में राजस्थान उर्दू अकादमी के पूर्व सदस्य असद अली असद ने स्वागताध्यक्ष के रूप में इस साप्ताहिक त्रिभाषा गोष्ठी के 14 वर्षों के निरंतर सफर की रूपरेखा साझा की। तत्पश्चात असद अली असद ने— “मुहब्बत का बयां उसकी ज़बां से, ज़बां लाया है वो ऐसी कहां से।” प्रस्तुत किया।
शायराना अंदाज़: गोष्ठी के संयोजक एवं संचालक डॉ. जिया उल हसन कादरी ने अपनी चर्चित रचना— “उसे फ़िरऔन का लाशा दिखाओ, ख़ुदा होने का जिस को भी गुमाँ है ज़िया” सुनाकर श्रोताओं की खूब तालियां बटोरीं।
कार्यक्रम में वरिष्ठ शायर शकील गौरी, वली मोहम्मद गौरी ‘वली’, कासिम बीकानेरी, महबूब देशनोकवी (देशनोक), वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जगदीश दान बारठ, धर्मेंद्र राठौड़ तथा अमर जुनूनी ने अपनी बहुरंगी रचनाओं का पाठ किया। अंत में युवा साहित्य प्रेमी ज़ुकरनेन ने सभी का आभार व्यक्त किया।
