विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस पर बीकानेर पीबीएम अस्पताल में जागरूकता संगोष्ठी
विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस पर बीकानेर पीबीएम अस्पताल में जागरूकता संगोष्ठी


- विशेषज्ञों ने साझा किए आधुनिक प्रबंधन के गुर
बीकानेर, 21 मार्च 2026 (शनिवार)। ‘विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस’ के अवसर पर बीकानेर पीडियाट्रिक सोसाइटी और सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मेडिकल कॉलेज के सेमिनार कक्ष में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य रेजिडेंट चिकित्सकों और समाज में डाउन सिंड्रोम के प्रति वैज्ञानिक समझ विकसित करना और प्रभावित बच्चों के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार करना रहा।


क्या है डाउन सिंड्रोम? ट्राइसोमी-21 का वैज्ञानिक पक्ष
शिशु रोग विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. जी.एस. तंवर ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बताया कि डाउन सिंड्रोम दुनिया भर में सबसे सामान्य क्रोमोसोमल विकार है, जो लगभग हर 700 जीवित जन्मों में से एक बच्चे में पाया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, मनुष्य के शरीर में 23 जोड़े गुणसूत्र (कुल 46) होते हैं, लेकिन डाउन सिंड्रोम की स्थिति में 21वें क्रोमोसोम की एक अतिरिक्त प्रति (Trisomy-21) बन जाती है। इस अतिरिक्त जेनेटिक मटेरियल के कारण बच्चे में विशिष्ट शारीरिक लक्षण, बौद्धिक अक्षमता और न्यूरो-विकासात्मक विलंब देखा जाता है।


प्रमुख लक्षण और स्वास्थ्य चुनौतियां
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. दिव्या ने अपनी विस्तृत प्रस्तुति में बताया कि इन बच्चों में कई अंगों से संबंधित जटिलताएं हो सकती हैं:
शारीरिक लक्षण: चपटा चेहरा, ऊपर की ओर झुकी आंखें, छोटी गर्दन और हाथों की हथेली में एक ही गहरी रेखा (Simian Crease)।
चिकित्सीय समस्याएं: हृदय रोग (Congenital Heart Disease), थायरॉयड विकार, श्वसन संबंधी दिक्कतें, सुनने और देखने की क्षमता में कमी।
भविष्य के जोखिम: डॉ. तंवर ने आगाह किया कि हालांकि अब चिकित्सा विज्ञान की मदद से इन बच्चों की जीवन प्रत्याशा बढ़ी है, लेकिन इनमें शुरुआती उम्र में डिमेंशिया और रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया) का जोखिम सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक रहता है।
प्रसव पूर्व निदान और मातृ आयु का प्रभाव
विशेषज्ञों ने चर्चा के दौरान स्पष्ट किया कि मातृ आयु का अधिक होना (Advanced Maternal Age) इस विकार के लिए एक बड़ा जोखिम कारक है। वर्तमान में गर्भावस्था के दौरान विशिष्ट ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासोनोग्राफी (NT Scan) के माध्यम से प्रसव पूर्व निदान (Prenatal Diagnosis) संभव है। समय रहते पहचान होने पर माता-पिता को उचित परामर्श और प्रबंधन के लिए तैयार किया जा सकता है।
सकारात्मक सामाजिक वातावरण की अपील
प्रोफेसर डॉ. मुकेश बेनीवाल और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सारिका स्वामी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए समाज से अपील की कि इन बच्चों के प्रति संवेदनशीलता रखें। उन्होंने कहा कि यदि प्रारंभिक अवस्था में ही (Early Intervention) फिजियोथेरेपी और स्पीच थेरेपी जैसे उपचार दिए जाएं, तो ये बच्चे अपने विकासात्मक मील के पत्थर प्राप्त कर बेहतर जीवन जी सकते हैं। संगोष्ठी में लगभग 40 रेजिडेंट चिकित्सकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और आधुनिक उपचार पद्धतियों पर चर्चा की।
