सीएम केजरीवाल की पत्नी को हाईकोर्ट से मिली राहत

सीएम केजरीवाल की पत्नी को हाईकोर्ट से मिली राहत
क्विक जेप्स विज्ञापन 13 oct 2026


दो वर्ष की सजा हो सकने वाले मामले के समन पर लगी रोक, जानें क्या है पूरा मामला
नयी दिल्ली , 6 नवम्बर।
इस बार ख़बर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल नहीं बल्कि उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल के विषय में है। दरअसल, दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को सुनीता केजरीवाल को दो विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में नाम दर्ज कराकर कथित तौर पर कानून का उल्लंघन करने के मामले में निचली अदालत के समन पर रोक लगा दी।

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न्यायमूर्ति अमित बंसल ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली सुनीता केजरीवाल की याचिका पर राज्य के साथ-साथ शिकायतकर्ता को भी नोटिस जारी किया, जिसमें उन्हें आरोप के संबंध में 18 नवंबर को अदालत में पेश होने के लिए कहा गया था। अगली सुनवाई 1 फरवरी को होगी। अदालत ने कहा, “इस बीच, विवादित आदेश के क्रियान्वयन पर रोक रहेगी।”

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भाजपा नेता हरीश खुराना ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री की पत्नी ने जन प्रतिनिधित्व (आरपी) अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। खुराना ने दावा किया कि सुनीता केजरीवाल को यूपी के साहिबाबाद विधानसभा क्षेत्र (संसदीय क्षेत्र गाजियाबाद) और दिल्ली के चांदनी चौक विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में मतदाता के रूप में पंजीकृत किया गया था, जो आरपी अधिनियम की धारा 17 का उल्लंघन था।

उन्होंने दावा किया कि अधिनियम की धारा 31 के तहत अपराध के लिए सुनीता केजरीवाल को दंडित किया जाना चाहिए, जो झूठी घोषणाएं करने से संबंधित है।वहीं, सुनीता केजरीवाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन ने उच्च न्यायालय के समक्ष दलील दी कि ट्रायल कोर्ट का आदेश बिना दिमाग का उचित उपयोग किए पारित किया गया था।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दो चुनावी कार्ड रखना कोई समस्या नहीं है और याचिकाकर्ता ने कोई गलत बयान दिया था, यह दिखाने के लिए रिकॉर्ड का कोई सबूत नहीं था। 29 अगस्त को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अरजिंदर कौर ने याचिकाकर्ता को 18 नवंबर को तलब किया था।

मजिस्ट्रेट ने कहा था, “शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों की गवाही पर विचार करने के बाद, इस अदालत की सुविचारित राय है कि प्रथम दृष्टया आरोपी व्यक्ति, सुनीता केजरीवाल, पत्नी अरविंद केजरीवाल, के खिलाफ दंडनीय अपराधों के कथित कमीशन के लिए मामला बनता है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31। इसलिए, आरोपियों को तदनुसार बुलाया जाए।”

गौरतलब है कि इस अपराध के लिए अधिकतम दो साल की जेल की सज़ा हो सकती है।

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