आत्म-कल्याण के लिए ‘स्व’ को पहचानना आवश्यक, खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरिश्वरजी का बीकानेर से विहार

आत्म-कल्याण के लिए 'स्व' को पहचानना आवश्यक, खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरिश्वरजी का बीकानेर से विहार
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बीकानेर, 10 फ़रवरी । खरतरगच्छाधिपति आचार्यश्री जिनमणिप्रभ सूरिश्वरजी महाराज ने मंगलवार को बीकानेर से फलौदी और जैसलमेर की ओर विहार किया। नाल गांव स्थित कुशलदादा गुरुदेव की दादाबाड़ी में दर्शन-वंदन के पश्चात, आचार्यश्री के साथ गणिवर्य मयंक प्रभ सागर, मेहुल प्रभ सागर, मुनि मंथन प्रभ सागर और बालमुनि मीत प्रभ सागर सहित साध्वी दीपमाला व शंखनिधि ने पदविहार प्रारंभ किया। इस अवसर पर नाल, बीकानेर और गंगाशहर के सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने नम आंखों से गुरुदेव को विदाई दी।

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उल्लेखनीय है कि चातुर्मास 2017 के लगभग 8 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आचार्यश्री बीकानेर पधारे थे। उन्होंने गंगाशहर स्थित 177 वर्ष प्राचीन ‘गोल मंदिर’ (श्री सांवलिया पार्श्वनाथ भगवान मंदिर) के नवनिर्मित भव्य स्वरूप और देव-प्रतिमाओं के प्रतिष्ठा महोत्सव में अपना पावन सान्निध्य प्रदान किया। इस मंदिर का जीर्णोद्धार सेठ श्री फौजराज बांठिया पार्श्वनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट द्वारा संपन्न कराया गया है।

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शरीर नश्वर है, आत्मा अजर-अमर: विहार देशना
विहार से पूर्व अपनी देशना में आचार्यश्री ने जीवन की नश्वरता और आत्मा की अमरता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा, “84 लाख जीव योनियों के चक्र में मनुष्य जीवन ही एकमात्र ऐसा अवसर है, जहां आत्म-कल्याण का पुरुषार्थ संभव है। शरीर की सुविधाओं के लिए तो हमें अनेक जन्म मिले हैं और मिलते रहेंगे, लेकिन आत्म-साधना के लिए केवल यही मनुष्य देह है।” उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें उन चीजों का संग्रह करना चाहिए जो जन्म-जन्मांतर तक हमारे साथ चलें, और वे केवल हमारे ‘कर्म’ और ‘आत्मा की शुद्धि’ हैं।

महावीर की देशना: जातिवाद नहीं, मनुष्यता ही धर्म
आचार्यश्री ने भगवान महावीर के सिद्धांतों को उद्धृत करते हुए कहा कि प्रभु महावीर जातिवाद में विश्वास नहीं करते थे। उनके अनुसार सभी की एक ही जाति है—’मनुष्य’ और उसका धर्म है ‘मनुष्यता’। तत्वार्थ सूत्र का हवाला देते हुए उन्होंने समझाया कि सभी मनुष्य परस्पर प्रेम और सद्भाव से रहें। ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ के सिद्धांत पर चलते हुए हमें एक-दूसरे का उपकारी बनना चाहिए। उन्होंने अंत में संदेश दिया कि आप किसी भी संप्रदाय के क्यों न हों, यदि चिर-आनंद और परम शांति की प्राप्ति करनी है, तो अपनी आत्मा के प्रति समझ पैदा करना अनिवार्य है।

विहार के दौरान खरतरगच्छ युवा परिषद, महिला परिषद और बाल वाटिका के बच्चों सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग पैदल चलकर गुरुदेव को वंदना करने पहुंचे।

 

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