गंगाशहर में 162वां मर्यादा महोत्सव संपन्न, मुनि कमल कुमार ने किया लाडनूं प्रस्थान
तेरापंथ भवन में उपस्थित साधु -साध्वियां



गंगाशहर (बीकानेर), 25 जनवरी। मर्यादा महोत्सव के समापन के पश्चात मुनि श्री कमल कुमार जी (ठाणा 4) ने आचार्य श्री महाश्रमण जी के दर्शनार्थ लाडनूं की ओर प्रस्थान किया। मुनि श्री के विदाई जुलूस में जनमानस का सैलाब उमड़ पड़ा। ‘वन्दे गुरुवरम’ के जयघोष के साथ हजारों श्रावक-श्राविकाओं ने नम आंखों से मुनि श्री को मंगल विदाई दी। आज सुबह 10 .30 बजे विहार के समय तेरापंथ भवन के आस पास रास्ता जाम हो गया।


इससे पूर्व जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की आधारशिला और अनुशासन के महाकुंभ 162वें मर्यादा महोत्सव का तीन दिवसीय समारोह रविवार को गंगाशहर स्थित तेरापंथ भवन में श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। ‘उग्र विहारी’ तपोमूर्ति मुनि श्री कमल कुमार जी स्वामी के सान्निध्य और सेवा केंद्र व्यवस्थापिका साध्वी श्री विशदप्रज्ञा जी व साध्वी श्री लब्धियशा जी के पावन मार्गदर्शन में आयोजित इस उत्सव के तीसरे दिन धर्मसंघ के ‘छोटे संविधान’ की महत्ता पर प्रकाश डाला गया।


मर्यादा ही तेरापंथ का प्राण- मुनि कमल कुमार
समारोह के समापन अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनि श्री कमल कुमार जी ने कहा कि आचार्य भिक्षु द्वारा रचित मर्यादाओं के कारण ही तेरापंथ धर्मसंघ आज विश्वभर में निरंतर विकास कर रहा है। उन्होंने बताया कि मर्यादा महोत्सव के तीसरे दिन ‘बड़ी हाजरी’ का वाचन किया जाता है, जहाँ समस्त चतुर्विध धर्मसंघ खड़े होकर पांच महाव्रतों, समितियों और गुप्तियों के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करता है। मुनि श्री ने जोर देकर कहा कि अनुशासन ही वह शक्ति है जो संघ में शांति और समन्वय बनाए रखती है। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु द्वारा रचित मर्यादा का सभी साधु – साध्वियां खड़े होकर वाचन करते हैं ओर पांच महाव्रत, पांच समिति,तीन गुप्ति के प्रति श्रद्धा प्रणत होते है। मर्यादा ओर अनुशासन के प्रति संकल्पित होते है।
दुनिया का सबसे छोटा संविधान- साध्वी विशदप्रज्ञा
साध्वी श्री विशदप्रज्ञा जी ने ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित करते हुए बताया कि आचार्य भिक्षु ने वि.सं. 1832 में पहली मर्यादा का निर्माण किया था।अंतिम मर्यादा पत्र वि.स.1859 में लिखा गया था। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु ने मात्र एक पन्ने में जो मर्यादाएं लिखीं, वे संसार का सबसे छोटा और प्रभावी संविधान हैं। इस संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें व्यक्तिगत शिष्य बनाने की मनाही है और दीक्षा केवल आचार्य के नाम पर ही दी जा सकती है। तेरापंथ जैन धर्म का पर्याय बन चुका है। आचार्य श्री भिक्षु ने जिन मौलिक मर्यादाओं का निर्माण किया गया उसमें आज तक एक भी परिवर्तन नही हुआ है।आचार्य भिक्षु ने एक पन्ने में मर्यादा लिखी जो संसार का सबसे छोटा संविधान है। जो दुनिया के लिए एक मिशाल हैं।
मर्यादा की क्यों आवश्यकता होती है ?
साध्वी श्री ने कहा कि जब हम संघ, समुदाय में रहते तब अनुशासन ओर व्यवस्था के बिना जीवन जीना कठिन होता है। समुदाय में न्याय की अपेक्षा होती है। प्रेम व सम्मन्वय की अपेक्षा होती है।भगवान महावीर स्वामी के समय भी गणधरों के द्वारा अपने अपने शिष्य बनाये जाते थे। आचार्य भिक्षु ऐसे पहले आचार्य थे जिन्होंने व्यक्तिगत शिष्य – शिष्याऐ बनाने की मनाही की। तेरापंथ में दीक्षा केवल आचार्य के नाम से ही दी जा सकती है। यह आचार्य श्री भिक्षु का जो एक ऐतिहासिक फैसला था।

पहला मर्यादा महोत्सव आज से 162 साल पहले बालोतरा में मनाया गया
साध्वी श्री लब्धियशा जी ने बताया कि तेरापंथ धर्म संघ के चतुर्थ आचार्य आचार्य श्री जीतमल जी जयाचार्य जी ने तेरापंथ धर्म संघ में तीन महोत्सव मनाने शुरू किये आचार्य श्री का पट्टोत्सव, आचार्य श्री भिक्षु का चरमोत्सव, एवं मर्यादा महोत्सव। जिसका महत्व शताब्दियों तक बना रहेगा। साध्वी श्री लब्धियशा जी ने कहा कि आचार्य अष्ठ संपदा के धनी होते है। आचार्य श्री भिक्षु ने तेरापंथ धर्म संघ में मर्यादाओं का निर्माण किया और साधु साध्वियों को मर्यादित व अनुशासित साधु जीवन जीने का मार्ग का निर्माण किया। गुरू में दुरदृष्टि वाले होते है। उस समय इतने साधु संत नही थे लेकिन आज जब हजारों की संख्या में चरित्रत्माऐं है तब हमें मर्यादा व अनुशासन की महता समझ में आ रही है।
उन्होंने कहा कि पहला मर्यादा महोत्सव आज से 162 साल पहले बालोतरा में मनाया गया। मर्यादा महोत्सव मनाने का मुह्रत बहुत शुभ था। आने वाली शताब्दियों में भी इसका महत्व कम नहीं होने वाला है। जब तक मर्यादा का सम्मान होगा, मर्यादा के प्रति श्रद्धा होगी, एवं मर्यादा की पालना होगी तब तक तेरापंथ धर्म संघ का विकास होता रहेगा। ओर इस धर्म संघ की छत्रछाया में आगे बढ़ते रहेगे, स्वस्थ रहेगे, मस्त रहेगे और जप तप ध्यान स्वाध्याय से आत्मा का कल्याण करते रहेंगे। साध्वियों के समूह ने मर्यादा के महत्व पर सामूहिक गीतिका का गान किया।

दानदाताओं का सम्मान और तपस्या की अनुमोदना
कार्यक्रम के दौरान तेरापंथी सभा गंगाशहर द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए सुमेरमल दफ्तरी परिवार के सुरेश – भारती -खुश (शरद) दफ्तरी एवं परिजनों का ‘आचार्य श्री महाश्रमण अंतरराष्ट्रीय स्कूल’ के लिए बड़े अनुदान हेतु साहित्य और पताका भेंट कर सम्मानित किया गया। महासभा संरक्षक जैन लूणकरण छाजेड़, अध्यक्ष नवरतन बोथरा, प्रधान अमरचन्द सोनी , उपाध्यक्ष पवन छाजेड़ , तेयुप मंत्री मांगीलाल बोथरा और अन्य पदाधिकारियों ने यह सम्मान प्रदान किया। साथ ही, सुरेंद्र भुरा की आठ दिवसीय तपस्या की भी सराहना की गई। तेरापंथी सभा के अध्यक्ष नवरतन बोथरा ने मुनि श्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की।
