सबसे पहले पहुंचने वाले दूल्हे को मिलेगी बाइक, 150 जोड़े रचायेंगे इतिहास
बीकानेर में आज 'सावा ओलंपिक


- बीकानेर में आज ‘सावा ओलंपिक
बीकानेर, 10 फ़रवरी। राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी बीकानेर में आज आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता का महाकुंभ ‘पुष्करणा ओलंपिक सावा’ आयोजित हो रहा है। परकोटे के भीतर बसे पुराने शहर को एक विशाल विवाह मंडप के रूप में सजाया गया है, जहाँ आज 150 से अधिक दूल्हा-दुल्हन एक ही दिन पाणिग्रहण संस्कार के सूत्र में बंधेंगे। इस सावे की सबसे अनूठी बात यह है कि समय की पाबंदी को प्रोत्साहित करने के लिए सबसे पहले विवाह स्थल पहुँचने वाले दूल्हे को मोटरसाइकिल और दुल्हन पक्ष को नकद राशि व साड़ी उपहार स्वरूप दी जाएगी।


करीब 500 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज के दौर में भी प्रासंगिक बनी हुई है। ज्योतिष और वास्तुविद राजेश व्यास के अनुसार, इस सामूहिक आयोजन का मुख्य उद्देश्य मध्यम और गरीब परिवारों को विवाह के भारी-भरकम आर्थिक बोझ से बचाना है। सीमित मेहमानों और न्यूनतम खर्च के साथ होने वाला यह आयोजन विश्व भर में अपनी सादगी और सामूहिकता के लिए प्रसिद्ध है।


पुरस्कारों की झड़ी: समय पर पहुँचने का अनूठा प्रोत्साहन
सावे की परंपराओं को निभाने और समय प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न संस्थाओं ने आकर्षक पुरस्कारों की घोषणा की है:
मोटरसाइकिल का इनाम: ‘कर्मवान संगठन’ द्वारा शाम 4 बजे के बाद सबसे पहले पहुँचने वाले भाग्यशाली दूल्हे को बाइक भेंट की जाएगी।
लाखों की शगुन राशि: ‘सावित्री कल्ला ट्रस्ट’ ने प्रथम आने वाले दूल्हे को 51 हजार, दूसरे को 31 हजार और तीसरे को 21 हजार रुपये देने का निर्णय लिया है। इसके अलावा 8 अन्य दूल्हों को भी 5100-5100 रुपये दिए जाएंगे।
दुल्हन पक्ष को सम्मान: शाम 7 बजे बारह गुवाड़ में गणेश परिक्रमा हेतु पहले पहुँचने वाले 25 दुल्हन पक्षों को साड़ी और 3100 रुपये शगुन स्वरूप प्रदान किए जाएंगे।
विधायक की पहल और नगर निगम की सजावट
सामाजिक सरोकार को मजबूती देते हुए बीकानेर पश्चिम विधायक जेठानन्द व्यास ने सावे में शामिल होने वाली सभी कन्याओं को 11-11 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। इस पहल को कन्या सम्मान और सामाजिक सहभागिता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।आयोजन की भव्यता के लिए नगर निगम ने आचार्यों का चौक, कीकाणी व्यासों का चौक, हर्षों का चौक और बारह गुवाड़ सहित पूरे परकोटे में विशेष सजावट और रोशनी करवाई है।
500 साल पुरानी परंपरा का आधुनिक स्वरूप
इतिहासकारों के अनुसार, पहले यह सावा हर 4 साल में एक बार होता था, जिसे बाद में समय की मांग को देखते हुए 2 साल में एक बार किया जाने लगा। पूरे दिन पुराने शहर की तंग गलियों में विवाह की रस्में, मंगल गीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूँज सुनाई देगी। बिना किसी तामझाम और फिजूलखर्ची के होने वाला यह ‘ओलंपिक सावा’ पूरे देश के लिए मितव्ययी विवाह का एक बेहतरीन मॉडल पेश करता है।
