अजित फाउंडेशन की संगोष्ठी में देश की महान रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर मंथन
अजित फाउंडेशन की संगोष्ठी में देश की महान रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर मंथन


- ‘पिंजर’, ‘रसीदी टिकट’ और ‘कागज़ ते कैनवास’ के माध्यम से स्त्री चेतना व विभाजन की पीड़ा को किया याद
बीकानेर, 2 जून । अजित फाउण्डेशन द्वारा आयोजित प्रसिद्ध ‘हथाई’ कार्यक्रम के अंतर्गत देश की विख्यात कवयित्री एवं उपन्यासकार अमृता प्रीतम के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस साहित्यिक संगोष्ठी में उपस्थित वक्ताओं ने अमृता प्रीतम के अप्रतिम साहित्यिक योगदान, उनकी मानवीय संवेदनाओं और विशेषकर नारी चेतना व स्त्री अस्मिता को प्रखर रूप से अभिव्यक्त करने वाली कालजयी रचनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।


मानवीय पीड़ा और स्त्री अस्मिता की सशक्त आवाज़: सुरेश पुरोहित


संगोष्ठी के मुख्य वक्ता और वरिष्ठ शिक्षाविद् सुरेश पुरोहित ने अपने उद्बोधन में कहा कि अमृता प्रीतम भारतीय साहित्य जगत की एक ऐसी सशक्त और निर्भीक रचनाकार थीं, जिन्होंने समाज में व्याप्त रूढ़ियों, स्त्री अस्मिता के संघर्ष और मानवीय पीड़ा को अपनी लेखनी के माध्यम से बेहद प्रभावशाली ढंग से दुनिया के सामने रखा। उन्होंने लेखिका की बहुचर्चित कृतियों ‘पिंजर’ एवं ‘कागज़ ते कैनवास’ का विशेष रूप से उल्लेख किया। इसके साथ ही, भारत-पाक विभाजन के दर्द को बयां करती उनकी अमर कविता ‘अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ’ की पंक्तियों को याद करते हुए आज के दौर में भी उनके साहित्य की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
‘रसीदी टिकट’ और प्रेम का अनूठा दृष्टिकोण
युवा कवि आनन्द पुरोहित ने अमृता प्रीतम की प्रसिद्ध आत्मकथा ‘‘रसीदी टिकट’’ पर केंद्रित संवाद में कहा कि लेखिका ने सामाजिक ढांचे की बनी-बनाई पारंपरिक मान्यताओं को तोड़ते हुए अपने जीवन को पूरी ईमानदारी और रचनात्मकता के साथ जिया। उन्होंने अमृता प्रीतम के जीवन के अनछुए पहलुओं को साझा करते हुए प्रख्यात गीतकार साहिर लुधियानवी और चित्रकार इमरोज के साथ जुड़े उनके जीवन के बेहद रोचक और आत्मीय प्रसंगों को श्रोताओं के सामने रखा।
इसी क्रम में युवा साहित्यकार आनन्द छंगाणी ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अमृता प्रीतम का संपूर्ण जीवन और वैचारिक संसार प्रेम के एक नए व व्यापक दृष्टिकोण का पोषक है। उन्होंने अपनी वैचारिक स्वतंत्रता से कभी कोई आत्म-समझौता नहीं किया और निरंतर अपनी कलम से साहित्य को नए आयाम दिए।
विभाजन की विभीषिका और नारी संघर्ष का जीवंत चित्रण
संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अमृता प्रीतम ने अपनी साहित्यिक रचनाओं में भारत-पाकिस्तान विभाजन की विभीषिका और उस दौर में महिलाओं द्वारा झेले गए अभूतपूर्व संघर्ष को बखूबी उकेरा है। उनके द्वारा रचित कई साहित्यिक कृतियां आज वैश्विक स्तर पर चिरस्थायी धरोहर बन चुकी हैं।
इस वैचारिक हथाई कार्यक्रम में मयंक शर्मा, दीक्षा व्यास, उषा बिस्सा सहित साहित्य जगत से जुड़े कई प्रबुद्ध सदस्यों ने भाग लिया और अपने-अपने दृष्टिकोण से अमृता प्रीतम की लेखनी के प्रति अपनी कृतज्ञता व श्रद्धा प्रकट की।


