आगम’ की गहराई में छिपे हैं जीवन के अनमोल रत्न, शांतिनिकेतन में साध्वी लब्धियशा ने समझाया जैन साधना का आधार
शांतिनिकेतन में साध्वी लब्धियशा ने समझाया जैन साधना का आधार


गंगाशहर (बीकानेर), 26 जनवरी। गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर गंगाशहर स्थित शांतिनिकेतन सेवा केंद्र में आध्यात्मिक चेतना की रसधार बही। श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के तत्वावधान में आयोजित विशेष प्रवचन सभा में साध्वी श्री लब्धियशा जी ने जैन साधना पद्धति के मूल स्तंभ ‘आगम’ की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने ‘आगम’ शब्द के प्रत्येक अक्षर की व्याख्या करते हुए इसे जीवन परिवर्तन का महामंत्र बताया।


‘आगम’ शब्द की त्रिवेणी व्याख्या
साध्वी श्री लब्धियशा जी ने बताया कि आगम केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्म-कल्याण का मार्ग है। उन्होंने इसे तीन अक्षरों के माध्यम से परिभाषित किया।
‘आ’ (आप्त पुरुषों की वाणी): यह तीर्थंकरों की वह दिव्य देशना है जो मेघ के समान शीतल और असरदार होती है। मान्यता है कि जो एक बार भगवान की साक्षात् वाणी सुन लेता है, वह सात जन्मों तक श्रवण दोष (बहरापन) से मुक्त रहता है।


‘ग’ (गणधरों द्वारा गुम्फित): भगवान की वाणी को गणधर सूत्रों में पिरोते हैं। गणधर इतने प्रभावशाली होते हैं कि उनकी देशना का प्रभाव 100 वर्षों तक बना रहता है। उन्होंने आर्य सुधर्मा की देशना से जम्बू स्वामी के वैराग्य का उदाहरण देते हुए गणधरों की शक्ति को प्रतिपादित किया।
‘म’ (मुनियों द्वारा मंथन): मुनियों की साधना का आधार ही आगम का चिंतन और स्वाध्याय है। जैन शास्त्रों के अनुसार मुनि की दिनचर्या में ध्यान और स्वाध्याय के प्रहर निश्चित हैं, जो उन्हें तत्व ज्ञान की ओर ले जाते हैं।
अहंकार से अमृत की ओर: शय्यंभव का प्रसंग
प्रवचन के दौरान साध्वी जी ने इतिहास के पन्नों से आचार्य प्रभव और शय्यंभव के प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कैसे एक प्रकांड विद्वान और निर्ग्रंथ धर्म के विरोधी शय्यंभव का हृदय परिवर्तन मात्र एक वाक्य— “अहो कष्टं अहो कष्टं तत्त्वं विझायते न हि” (अहो! खेद है कि तत्व को नहीं समझा जा रहा है) से हो गया। इस अमृतवाणी ने उनके अहंकार को मिटाकर उन्हें संयम के पथ पर अग्रसर कर दिया।
आचार्य के दायित्व और योग्यता
साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि हर मुनि में 14 पूर्वों का ज्ञान नहीं होता। आचार्य पद के लिए विशेष योग्यताओं की आवश्यकता होती है। एक समर्थ आचार्य का मुख्य दायित्व अपने योग्य उत्तराधिकारी का चयन करना और उसे संघ के भविष्य के लिए तैयार करना होता है।
सभा की गतिविधियां और आगामी कार्यक्रम
समारोह के प्रारंभ में साध्वी श्री गौरव प्रभा जी ने अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के अंत में तेरापंथी सभा गंगाशहर के उपाध्यक्ष पवन छाजेड़ ने आगामी धार्मिक कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की और सभी श्रावकों से सहभागिता की अपील की।
