माथे पर तिलक लगाने का न्यूरोलॉजिकल और वैज्ञानिक सच

माथे पर तिलक लगाने का न्यूरोलॉजिकल और वैज्ञानिक सच
क्विक जेप्स विज्ञापन 13 oct 2026
  • सनातन परंपराओं को समर्पित बीकानेर में ‘हम ललाट तिलक अभियान’ की अनूठी पहल

बीकानेर, 19 अक्टूबर। सनातन संस्कृति में माथे पर तिलक लगाने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा वैज्ञानिक, न्यूरोलॉजिकल और मनोवैज्ञानिक आधार छिपा है। ‘सनातन धर्म साधना पीठ’ के पवन कुमार राठी द्वारा साझा किए गए इस अध्ययन और विचार में तिलक लगाने के फायदों और परंपरा के वैज्ञानिक स्वरूप को विस्तार से समझाया गया है।

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आलेख के अनुसार, शरीर के सात प्रमुख चक्रों में सबसे महत्वपूर्ण ‘आज्ञा चक्र’ दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है, जिसे अध्यात्म में ‘तीसरी आंख’ भी कहा जाता है। यह चक्र मन, बुद्धि और एकाग्रता का मुख्य केंद्र है। इस संवेदनशील स्थान पर तिलक लगाने से हल्का दबाव पड़ता है, जिससे तंत्रिका संकेत सक्रिय होते हैं और व्यक्ति की एकाग्रता व फोकस में वृद्धि होती है। इसके अलावा, चंदन की ठंडी तासीर मस्तिष्क को शीतलता और शांति प्रदान करती है, जबकि रोली और भस्म में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल गुण स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभदायक हैं।

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लेख में यह भी बताया गया है कि वैष्णव, शैव और शाक्त परंपराओं में अलग-अलग तरीकों से लगाए जाने वाले तिलक शरीर की ऊर्जा और जीवन शैली को संतुलित करने का कार्य करते हैं। सनातन धर्म साधना पीठ द्वारा वर्तमान पीढ़ी को इस समृद्ध विरासत से जोड़ने के लिए ‘हम ललाट तिलक अभियान’ के तहत प्रथम चरण में सवा लाख सनातनी साथियों को जोड़ने का संकल्प लिया गया है, ताकि दैनिक जीवन में इस वैज्ञानिक परंपरा को पुनर्जीवित किया जा सके।

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