णमो लोए सव्व साहूणं: पाप क्षय और आत्मशुद्धि का साधन – साध्वी श्री पुण्ययशा


बीड़दी, 30 नवंबर । युगप्रधान, शांतिदूत महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वी श्री पुण्ययशाजी के सान्निध्य में आज बिड़दी में इमरतलालजी देवड़ा के निवास स्थान पर स-भिक्खु आध्यात्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया। साध्वी श्री पुण्ययशाजी ने अनुष्ठान से पूर्व अपने मंगल उद्बोधन में परमेष्ठी मंत्र के पांचवें पद ‘णमो लोए सव्व साहूणं’ के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह पद प्रथम चारों पदों की आत्मा है और साधु के बिना किसी भी पद को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
पद का आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ
साध्वी श्री पुण्ययशाजी ने फरमाया कि इस पद में मन को नियंत्रित करने की अद्भुत क्षमता है। यह किसी साधु विशेष को नहीं, बल्कि केवल गुण निष्पन्न साधु को नमस्कार करता है। इसकी आराधना साधुता की क्षमता का विकास करती है, और कर्मों की निर्जरा व स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ मैत्री भाव को भी विकसित करती है। उन्होंने कहा कि इस जप-विधि से न केवल शरीर सधता है, बल्कि पाप कर्मों का क्षय होता है, आत्मा शुद्ध होती है एवं भाव और मन भी संतुलित रहते हैं।



विशेष मंत्रों का विवेचन
साध्वीश्री जी ने विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस पद के साथ बीजाक्षरों के प्रयोगों का विवेचन किया। ग्रहों की उपशांति (राहु, केतु, शनि): इस पद को ‘ॐ ह्रीं’ के साथ शक्ति केंद्र और ज्ञान केंद्र पर जपा जाता है। पारस्परिक सौहार्द व गृहकलह निवारण: इसके लिए इस पद को ‘ॐ ऐं ह्रीं’ के साथ नीले रंग में जपा जाता है। उत्तम स्वास्थ्य: इस पद को ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं’ के बीजाक्षर के साथ जपा जाता है।



सामूहिक अनुष्ठान और उपस्थिति
मंत्रों का विस्तृत विवेचन करने के बाद, साध्वीश्री जी ने ह्रस्व, दीर्घ व प्लुत उच्चारण के साथ “ॐ ह्रीं णमो लोए सव्व साहूणं” पद का शनिवार सायं 4 से 9 बजे तक सामूहिक अनुष्ठान करवाया। इस अवसर पर साध्वीश्री विनितयशाजी, साध्वीश्री वर्धमानयशाजी, साध्वी श्री बोधिप्रभाजी सहित 31 भाई-बहनों ने भाग लिया। इस आध्यात्मिक आयोजन में पदमचन्दजी खटेड़, संजय जी छाजेड़, कौशलजी देवड़ा, जीतेशजी देवड़ा, दिलखुशजी देवड़ा, सुरेशजी देवड़ा, रमेशजी जैन, मुकेश देवड़ा आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे।








