बीकानेर की रातों में रम्मतों का जादू ,आचार्यों के चौक से बारह गुवाड़ तक गूँजी लोक संस्कृति; ‘अमर सिंह राठौड़’ और ‘नौटंकी शहजादी’ ने मोहा मन

बीकानेर की रातों में रम्मतों का जादू
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quicjZaps 15 sept 2025

बीकानेर, 1 मार्च 2026। छोटी काशी के नाम से विख्यात बीकानेर में फाल्गुनी रातों का उल्लास अब अपने चरम पर पहुँच गया है। रविवार रात शहर के ऐतिहासिक चौकों में पारंपरिक रम्मतों का मंचन हुआ, जहाँ लोक कलाकारों ने अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता और गायकी से प्राचीन संस्कृति को जीवंत कर दिया। आचार्यों के चौक, मरुनायक चौक और बारह गुवाड़ में देर रात तक चली इन रम्मतों ने हजारों दर्शकों को बाँधे रखा।

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वीर रस और श्रृंगार का संगम: तीन प्रमुख रम्मतें
शहर के अलग-अलग हिस्सों में कथा प्रधान रम्मतों के माध्यम से इतिहास और लोककथाओं का सजीव चित्रण किया गया:

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आचार्यों का चौक: यहाँ श्री चामुण्डा भैरव कला संस्थान की ओर से ’’अमर सिंह राठौड़’’ की रम्मत पेश की गई। इसमें नागौर के राजा अमर सिंह की वीरता और उनके साथ हुए विश्वासघात के प्रसंगों ने दर्शकों में जोश भर दिया।

मरुनायक चौक: मरुनायक कला केन्द्र द्वारा ’’हेड़ाऊ महेरी’’ रम्मत का मंचन हुआ। श्रृंगार और हास्य रस से भरपूर इस रम्मत में कुंभलनेर के राजा-रानी के घरेलू किस्सों और चुटीले संवादों ने लोगों को खूब हंसाया।

बारह गुवाड़: यहाँ ’’नौटंकी शहजादी’’ रम्मत का आयोजन हुआ। देवर-भाभी के संवादों, लावणी और गीतों के माध्यम से विवाह के रोचक कथानक को खूबसूरती से पेश किया गया।

मरुनायक चौक में डांडिया और मंदिरों में फागोत्सव
रम्मतों के साथ-साथ शहर में नृत्य और भक्ति की अविरल धारा भी प्रवाहित हो रही है।

डांडिया नृत्य: शनिवार रात मरुनायक चौक में पारंपरिक डांडिया नृत्य का आयोजन हुआ, जिसमें कलाकारों की लयबद्ध ताल ने फागुन की रंगत बढ़ा दी।

बरसाने की होली: बारह गुवाड़ में रम्मत स्थल पर ही भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं पर आधारित ‘बरसाने की होली’ का उत्सव मनाया गया।

भक्ति संगीत: शहर के प्रमुख मंदिरों में फाल्गुनोत्सव के तहत विशेष भजन संध्याएं आयोजित की जा रही हैं, जहाँ भक्त अबीर-गुलाल के साथ भजनों की गंगा में डुबकी लगा रहे हैं।

परंपराओं का जीवंत रूप
बीकानेर की ये रम्मतें केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी मौखिक परंपराओं का संरक्षण हैं। इन आयोजनों में कलाकारों के संवाद और गायन की शैली आज भी वैसी ही है जैसी रियासत काल में हुआ करती थी। स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ शोधार्थी और पर्यटक भी इन सांस्कृतिक विरासतों को देखने के लिए बड़ी संख्या में चौकों में उमड़ रहे हैं।

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