चुनावी रंजिश में हुए हत्याकांड के 23 दोषियों को सजा, मृतकों को भी माना अपराधी

चुनावी रंजिश में हुए हत्याकांड के 23 दोषियों को सजा, मृतकों को भी माना अपराधी
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quicjZaps 15 sept 2025
  • भरतपुर का ऐतिहासिक फैसला

भरतपुर, 12 फ़रवरी । राजस्थान के भरतपुर की अपर जिला एवं सेशन न्यायालय ने करीब एक दशक पुराने बहुचर्चित ‘पीपला हत्याकांड’ में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए न्याय की मिसाल पेश की है। अदालत ने खूनी संघर्ष और हत्या के मामले में कुल 23 लोगों को दोषी करार दिया है। कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए 12 मुख्य आरोपियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई है, जबकि मारपीट के अन्य 11 दोषियों को 7-7 साल की जेल की सजा दी गई है।

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इस फैसले की सबसे विशेष बात यह रही कि सुनवाई के दौरान जिन तीन आरोपियों की मृत्यु हो चुकी थी, अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर उन्हें भी दोषी माना है। यह फैसला उन परिवारों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो पिछले 10 वर्षों से न्याय की आस में अदालतों के चक्कर काट रहे थे।

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क्या था 10 साल पुराना पीपला गांव का खूनी संघर्ष?
यह पूरा मामला 16 अगस्त 2015 का है, जब भरतपुर जिले के चिकसाना थाना क्षेत्र के पीपला गांव में चुनावी रंजिश को लेकर दो गुट आमने-सामने हो गए थे। विवाद इतना बढ़ा कि लाठी-डंडों से शुरू हुई मारपीट खूनी संघर्ष में तब्दील हो गई। इस दौरान सौदान सिंह नामक व्यक्ति ने राकेश पर गोली चला दी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना में दोनों पक्षों के कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पीड़ित पक्ष की शिकायत पर 54 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की थी। जांच के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में चालान पेश किया। लंबी कानूनी प्रक्रिया और गवाहों के बयानों के आधार पर अब जाकर इस मामले में अंतिम फैसला आया है।

सजा का विवरण और दोषियों के नाम
अदालत ने अपराध की प्रकृति के आधार पर दोषियों को दो श्रेणियों में विभाजित कर सजा सुनाई है:

12 दोषियों को आजीवन कारावास: इन मुख्य आरोपियों को हत्या और दंगा भड़काने का दोषी पाया गया।

11 दोषियों को 7 साल की जेल: मारपीट और हिंसा में शामिल रहने के कारण तेजपाल, अटल बिहारी, तेजसिंह, टीकम, दयाचंद, रघुवीर, प्रभु, वीरेंद्र, चरण सिंह, दिनेश और नरेंद्र को सात-सात साल की कड़ी सजा सुनाई गई है।

यह फैसला क्षेत्र में उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो चुनावी रंजिश या आपसी विवादों में कानून को अपने हाथ में लेते हैं।

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