राजस्थान में दो IAS अधिकारियों का तलाक, आपसी सहमति से सुलझा विवाद, हाईकोर्ट ने रद्द की FIR

STBA 5 JUNE 2026
quicjZaps 15 sept 2025
खमत खामणा

जयपुर ,10 फ़रवरी । राजस्थान कैडर के दो वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों, आशीष मोदी और भारती दीक्षित के बीच लंबे समय से चल रहा वैवाहिक विवाद अब कानूनी रूप से समाप्त हो गया है। जयपुर की फैमिली कोर्ट ने दोनों की आपसी सहमति के आधार पर 15 दिसंबर 2025 को तलाक की डिक्री जारी कर दी थी। इस मामले में नया मोड़ मंगलवार को तब आया जब राजस्थान हाईकोर्ट ने भारती दीक्षित द्वारा अपने पति और अन्य के खिलाफ दर्ज कराई गई आपराधिक प्राथमिकी (FIR) को भी रद्द करने का आदेश दिया।

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वर्तमान में आशीष मोदी सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के निदेशक के पद पर कार्यरत हैं, वहीं भारती दीक्षित वित्त विभाग में संयुक्त सचिव के रूप में अपनी सेवाएँ दे रही हैं। भारती दीक्षित ने पूर्व में आशीष मोदी पर गंभीर आरोप लगाते हुए जयपुर के एसएमएस (SMS) थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। FIR में उन्होंने पति पर शराब पीकर मारपीट करने, अवैध संबंधों और यहाँ तक कि पिस्तौल की नोक पर अपहरण कर बंधक बनाने जैसे सनसनीखेज आरोप लगाए थे।

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बेटी के भविष्य और पद की गरिमा के लिए समझौता
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान भारती दीक्षित की ओर से पक्ष रखा गया कि उन्होंने अपनी नाबालिग बेटी के भविष्य, सामाजिक प्रतिष्ठा और अपने प्रशासनिक पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए अपने पति के साथ समझौता कर लिया है। हालांकि, उन्होंने मामले में शामिल दो अन्य आरोपियों—सुरेंद्र विश्नोई और आशीष शर्मा—को राहत देने का विरोध किया था। भारती का तर्क था कि इन दोनों ने न केवल आशीष मोदी की सहायता की, बल्कि उन्हें धमकाने और अवैध हिरासत में रखने में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

जस्टिस अनिल उपमन की अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जब मुख्य विवाद पति-पत्नी के बीच था और उसमें समझौता हो चुका है, तो सह-आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। अदालत ने इसे ‘खंडित कार्रवाई’ बताते हुए पूरी FIR और उससे जुड़ी समस्त कानूनी कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘मैच्योरिटी’ की उम्मीद
मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय न्यायालय ने दोनों अधिकारियों के आचरण पर कड़ी टिप्पणी भी की। जस्टिस उपमन ने कहा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसे उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों से समाज उच्च स्तर की परिपक्वता (Maturity), विवेक और संवेदनशीलता की अपेक्षा करता है। अदालत ने खेद जताते हुए कहा कि इस मामले में जो आचरण सामने आया, वह इन उच्च पदों की गरिमा के अनुरूप नहीं था।

अदालत ने उम्मीद जताई कि भविष्य में ऐसे पदों पर बैठे अधिकारी अपने व्यक्तिगत विवादों को अधिक संयम और दूरदर्शिता के साथ सुलझाएंगे। इस फैसले के बाद अब दोनों अधिकारियों के बीच चल रहा कानूनी गतिरोध पूरी तरह समाप्त हो गया है।

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