बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत को संजोने का संकल्प

बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत को संजोने का संकल्प
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  • उछब थरपणा’ के तहत साफा-पाग कार्यशाला का आगाज़

बीकानेर, 09 अप्रैल। राजस्थान की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक धरोहर को भावी पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से बीकानेर के 538वें स्थापना दिवस के अवसर पर विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में ‘राजस्थानी साफा-पाग पगड़ी एवं कला संस्थान’ तथा ‘थार विरासत’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पांच दिवसीय ‘उछब थरपणा’ समारोह के अंतर्गत दो दिवसीय चंदा, साफा-पाग कार्यशाला का भव्य उद्घाटन हुआ।

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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यशाला का शुभारंभ किया। इस अवसर पर अपने संबोधन में रंगा ने कहा कि चंदा, साफा और पाग हमारी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बीकानेर की यह विशिष्ट कला न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी अपनी अलग पहचान रखती है। रंगा ने युवा पीढ़ी से आह्वान किया कि वे इस परंपरागत कला से जुड़कर इसमें नवाचार करें, ताकि इस ऐतिहासिक विरासत को जीवंत रखा जा सके।

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विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ कला विशेषज्ञ डॉ. राकेश किराडू ने बीकानेर की कलात्मक उत्कृष्टता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। वहीं, समारोह के संयोजक राजेश रंगा ने आयोजन की प्रासंगिकता बताते हुए कहा कि युवाओं द्वारा अपनी परंपरा को नई रंगत देने का यह प्रयास सराहनीय है।

कार्यशाला की प्रभारी मोना सरदार डूडी ने विशेष रूप से बालिकाओं में इस पारंपरिक कला के प्रति बढ़ते रुझान को एक सकारात्मक संकेत बताया। उन्होंने कहा कि कला का यह हस्तांतरण ही कार्यशाला की असली उपलब्धि है। समन्वय कृष्णचन्द पुरोहित ने बीकानेर की स्थापना के ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए बताया कि 1488 ई. से चली आ रही चंदा कला आज भी अपने मूल स्वरूप को कायम रखते हुए आधुनिक दौर के साथ कदम मिला रही है।

इस उद्घाटन समारोह में शहर के गणमान्य नागरिकों सहित कला प्रेमियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिनमें मोहित पुरोहित, गोपीकिशन छंगाणी और भवानी सिंह राठौड़ सहित कई प्रमुख व्यक्तित्व उपस्थित रहे। यह कार्यशाला आगामी दो दिनों तक युवाओं को साफा-पाग बांधने और चंदा कला की बारीकियों से रूबरू कराएगी।

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