मृत्यु निश्चित होने के बाद भी हम नहीं करते स्वीकार; आदि गणेश मंदिर में भागवत कथा के तीसरे दिन बोले पं. व्यास
मृत्यु निश्चित होने के बाद भी हम नहीं करते स्वीकार; आदि गणेश मंदिर में भागवत कथा के तीसरे दिन बोले पं. व्यास


- ‘श्याम ला गिरधारी…’ के भजनों पर झूमे श्रद्धालु; भगवान शिव के विवाह की सजीव झांकी ने मोहा मन
- समुद्र मंथन और नृसिंह अवतार के प्रसंगों से समझाया जीवन का सार; निष्काम कर्म को बताया सच्ची भक्ति
बीकानेर, 3 जून । बीकानेर के प्रसिद्ध श्री आदि गणेश मंदिर परिसर में आयोजित हो रही संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन बुधवार को भक्ति, अध्यात्म और मानवीय आदर्शों की त्रिवेणी बही। कथा व्यास पंडित सुनील व्यास ने जीवन के कड़वे सच और धर्म के मर्म को समझाते हुए प्रह्लाद चरित्र, समुद्र मंथन और शिव विवाह जैसे अलौकिक प्रसंगों की विस्तृत व्याख्या की। कथा के दौरान पूरा पंडाल ‘श्याम ला गिरधारी…’ जैसे सुमधुर भजनों से गुंजायमान रहा, जिस पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे।


माया को शाश्वत मानना मनुष्य की भूल, शरीर नश्वर
श्रद्धालुओं को ज्ञान और वैराग्य का पाथेय प्रदान करते हुए व्यास पीठाधीश्वर पंडित सुनील व्यास ने कहा कि भगवान जब धरा पर अवतार लेते हैं, तो वे अपनी योगमाया के साथ आते हैं। साधारण मनुष्य इस सांसारिक माया को ही शाश्वत (अमर) मान बैठता है और अपने इस नश्वर शरीर को प्रधान मान लेता है, जबकि यह शरीर मिट्टी का ढेर है।


उन्होंने मृत्यु के अकाट्य सत्य पर प्रकाश डालते हुए कहा, “यह संसार की सबसे बड़ी विडंबना है कि प्रत्येक जीव की मृत्यु पहले से ही निश्चित है, फिर भी हम व्यावहारिक जीवन में इस सत्य को स्वीकार नहीं करते। व्यक्ति अपने जीवन में जिस प्रकार के कर्म करता है, अंत समय में उसे उसी के अनुरूप गति और मृत्यु मिलती है।” उन्होंने आह्वान किया कि जो मनुष्य निष्काम भाव से प्रभु का स्मरण करते हैं, वे अपना जन्म और मरण दोनों ही सुधार लेते हैं।
सत्य की विजय का प्रतीक: नृसिंह अवतार व धु्रव चरित्र
कथा के मुख्य प्रसंग में पंडित व्यास ने भगवान नृसिंह अवतार की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि बालक प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा और विश्वास के सामने विवश होकर भगवान को खंभे से प्रकट होना पड़ा। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि सत्य, धर्म और अटूट भक्ति की हमेशा विजय होती है तथा अपने भक्तों की रक्षा के लिए परमात्मा किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने उपस्थित जनसमूह को सदैव संयमित, विनम्र और मधुर वाणी बोलने का महत्व भी समझाया। इसके साथ ही उन्होंने कपिल चरित्र, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र और जड़ भरत चरित्र के प्रेरक संस्मरण सुनाए।
शिव विवाह की झांकी पर उत्सव जैसा माहौल
कथा के दौरान जब भगवान शिव के विवाह का प्रसंग आया और भव्य झांकी निकाली गई, तो पूरा कथा पंडाल एक उत्सव के रूप में तब्दील हो गया। शिव विवाह के पारंपरिक भजनों और डमरू की थाप पर महिला व पुरुष श्रद्धालु देर तक नाचते-गाते रहे।
इसके बाद समुद्र मंथन की कथा सुनाते हुए महाराज ने एक अनूठा जीवन दर्शन दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार समुद्र मंथन से विष और अमृत दोनों निकले थे, ठीक उसी प्रकार हर इंसान के भीतर भी अच्छे और बुरे दोनों विचार मौजूद रहते हैं। जब हम सत्संग और स्वाध्याय के जरिए अपने मन का मंथन करेंगे, तभी हमें सही और गलत की पहचान होगी और हम भीतर छिपे विकारों के विष को त्यागकर अच्छाई का अमृत ग्रहण कर पाएंगे।
भजन मंडली ने बांधा समां
कथा के दौरान सुप्रसिद्ध रामसा व्यास के साथ आई भजन मंडली ने एक से बढ़कर एक भजनों की प्रस्तुतियां देकर श्रोताओं को रसविभोर कर दिया। पंडित सुनील व्यास ने अंत में भक्तों से क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा और संचय (संग्रह) की प्रवृत्ति का त्याग कर विवेक के साथ श्रेष्ठ कर्म करने का संकल्प दिलाया।


