मीनाक्षी नटराजन नामांकन विवाद में कांग्रेस के कानूनी और जमीनी संघर्ष के आगे झुका प्रशासन? चुनाव आयोग की समीक्षा ने पलटा पासा

मीनाक्षी नटराजन नामांकन विवाद में कांग्रेस के कानूनी और जमीनी संघर्ष के आगे झुका प्रशासन?
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भोपाल/दिल्ली, 10 जून। मध्य प्रदेश की राजनीति में बीते 24 घंटों से चला आ रहा हाई-प्रोफाइल ‘नामांकन ड्रामा’ आखिरकार कांग्रेस के पक्ष में झुकता नजर आ रहा है। राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने के मामले में केंद्रीय चुनाव आयोग के हस्तक्षेप के बाद स्थिति बदल गई है। कांग्रेस इसे लोकतंत्र की जीत और अपने प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के कड़े संघर्ष का परिणाम बता रही है।

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विवाद की जड़: नामांकन रद्द करने का आधार
9 जून को भोपाल में राज्यसभा के रिटर्निंग ऑफिसर (RO) ने बीजेपी उम्मीदवार महेश केवट की शिकायत पर मीनाक्षी नटराजन का नामांकन फॉर्म निरस्त कर दिया था। भाजपा का आरोप था कि नटराजन ने हैदराबाद कोर्ट में लंबित एक आपराधिक मामले की जानकारी अपने हलफनामे (Affidavit) में छिपाई है। RO के इस फैसले के बाद जारी फाइनल लिस्ट में केवल भाजपा के तीन उम्मीदवारों (तरूण चुग, महेश केवट और रजनीश अग्रवाल) के नाम ही शामिल थे।

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कानूनी दांवपेच: अभिषेक मनु सिंघवी के 4 तर्क
दिल्ली में चुनाव आयोग के मुख्यालय पहुंचे कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के नेतृत्व में आदेश को चुनौती दी। सिंघवी ने RO के फैसले को “कानूनी रूप से अमान्य” बताते हुए 4 मुख्य तर्क रखे:

संज्ञान (Cognizance) ही नहीं: जब तक मजिस्ट्रेट किसी मामले में संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू नहीं करता, तब तक कानून की नजर में मामला ‘लंबित’ नहीं माना जा सकता।

दो साल की सजा का प्रावधान: नियमों के अनुसार, केवल उन्हीं मामलों का खुलासा अनिवार्य है जिनमें 2 साल या उससे अधिक की सजा हो और कोर्ट ने आरोप तय (Charges Frame) कर दिए हों।

अधूरा नोटिस: कोर्ट ने केवल एक नोटिस भेजकर पक्ष जानना चाहा था, इसे आपराधिक मामला मानना गलत है।

आयोग का अधिकार: चुनाव आयोग के पास RO का फैसला पलटने का पूरा अधिकार है, जैसा पूर्व में हरियाणा और गुजरात के मामलों में देखा गया है।

सड़कों पर संघर्ष: भोपाल से दिल्ली तक प्रदर्शन
नामांकन रद्द होने की खबर के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भोपाल में सीईओ (CEO) दफ्तर के बाहर फर्श पर रात बिताई। कार्यकर्ताओं ने विरोध स्वरूप चुनाव कार्यालय के गेट पर आरएसएस (RSS) की यूनिफॉर्म तक टांग दी।

इधर दिल्ली में के.सी. वेणुगोपाल, जयराम रमेश, सचिन पायलट और दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गजों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात की। मीनाक्षी नटराजन ने बयान जारी कर कहा, “हमें संवैधानिक संस्थाओं पर उम्मीद है, इसीलिए हम लड़ रहे हैं।”

झारखंड में भी ‘नाम’ पर हंगामा
इसी दौरान झारखंड में राज्यसभा चुनाव के लिए एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के नामांकन को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया। कांग्रेस ने आपत्ति जताई कि 2008 में नाम ‘परिमल नाथवानी’ था, जबकि 2026 में ‘नाथवानी परिमल’ लिखा गया है। हालांकि, वहां RO ने उनके नामांकन को वैध ठहरा दिया है।

ताजा स्थिति: कांग्रेस की उम्मीदें बरकरार
देर शाम तक चली गहमागहमी के बाद सूत्रों के हवाले से खबर है कि चुनाव आयोग ने कांग्रेस के तर्कों को गंभीरता से लिया है। जीतू पटवारी ने कहा कि यह सीट ‘चोरी’ करने का प्रयास था, जिसके खिलाफ विधायकों का मार्च राष्ट्रपति भवन तक निकाला जाएगा। फिलहाल, आयोग के औपचारिक आदेश की प्रतीक्षा की जा रही है, जिसने संभवतः RO के प्रारंभिक फैसले पर रोक लगा दी है।

अभी तक जो तथ्य स्थापित हैं वे इस प्रकार हैं

10 जून को कांग्रेस का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से मिला और मांग की कि RO का आदेश पलटा जाए। कांग्रेस का तर्क था कि नटराजन के खिलाफ कोई आपराधिक मामला कानूनी रूप से अस्तित्व में नहीं है क्योंकि किसी भी अदालत ने निजी शिकायत पर संज्ञान नहीं लिया।
बैठक के बाद कांग्रेस ने RO के आदेश को “बेतुका”, “स्पष्ट रूप से गैरकानूनी” और “कानून के अधिकार के बिना” बताते हुए EC से तत्काल फैसला पलटने की मांग की।

 

ध्यान देने योग्य बात: यह ट्वीट एक राजनीतिक कार्यकर्ता (@ActivistSandeep) का है, कोई समाचार संस्था का नहीं। चुनाव आयोग के किसी आधिकारिक बयान या किसी प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान की खबर में अभी तक यह पुष्टि नहीं मिली है कि EC ने वाकई RO का आदेश पलटा या स्टे दिया।

संभव है यह खबर बिल्कुल ताजी हो और अभी मीडिया में आ रही हो — लेकिन सोशल मीडिया पर आई किसी भी जानकारी को तब तक पूरी तरह सच न मानें जब तक किसी विश्वसनीय स्रोत से उसकी पुष्टि न हो।

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