बीकानेर में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ा रहा ध्वनि प्रदूषण
बीकानेर में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ा रहा ध्वनि प्रदूषण



- 77 वर्षीय पर्यावरणविद् ने प्रशासन की चुप्पी और धरोहरों पर अतिक्रमण के खिलाफ खोला मोर्चा
बीकानेर, 11 जून। बीकानेर में पर्यावरण संरक्षण के लिए पिछले 38 वर्षों से समर्पित और ‘खेजड़ा एक्सप्रेस’ के संपादक 77 वर्षीय भगवानाराम प्रजापति ढाणी (भारती) ने ध्वनि प्रदूषण और ऐतिहासिक धरोहरों पर अतिक्रमण को लेकर प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उच्चतम न्यायालय के 18 जुलाई 2005 के ऐतिहासिक आदेश की अवहेलना देश में प्रदूषण के ‘तांडव’ को और बढ़ावा देगी।


सुप्रीम कोर्ट के आदेश और ध्वनि प्रदूषण का उल्लंघन
प्रजापति ने बताया कि उनके घर के सामने स्थित राम प्रजापति मंदिर में बजने वाले लाउडस्पीकर के खिलाफ उन्होंने एसीजेएम संख्या 1 (Bikaner) में मुकदमा (संख्या 2302/24, भगवानाराम बनाम रामदयाल शर्मा व अन्य) दर्ज करा रखा है। इसके बावजूद मंदिर में निरंतर स्पीकर बजाया जा रहा है।


उन्होंने आरोप लगाया कि:
पुलिस की गलत रिपोर्ट: नया शहर थाना पुलिस ने पहले मंदिर के समय को लेकर गलत जानकारी दी और अब ‘धीमी आवाज’ में भजन होने की बात कह रही है, जबकि आवाज सीधे घर के भीतर तक आती है।
सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी: उच्चतम न्यायालय के आदेश (पैरा संख्या 112, 151, 163 और 169) के अनुसार, किसी भी परिसर की आवाज उसके बाहर नहीं जानी चाहिए। प्रशासन इस आदेश की पालना करवाने में पूरी तरह विफल रहा है।
आस्था बनाम शोर: प्रजापति का तर्क है कि 50 साल पहले बिना स्पीकर के भी आस्था जीवित थी। आज स्पीकर के जरिए ‘राक्षसी शोर’ मचाना शास्त्रों और कानून दोनों का अपमान है।
ऐतिहासिक धरोहर ‘परकोटा’ पर अतिक्रमण का मुद्दा
ध्वनि प्रदूषण के साथ-साथ बीकानेर की प्राचीन धरोहर ‘परकोटा सफील’ के अस्तित्व पर भी संकट गहरा गया है। प्रजापति ने बताया कि:
- दुकानदारों ने बीकानेर की ऐतिहासिक दीवार (परकोटा सफील) को तोड़कर और ऐतिहासिक रास्तों पर कब्जा कर दुकानें बना ली हैं।
- इस निर्माण के दौरान पुराने पेड़-पौधों को काट दिया गया, जिससे पक्षियों, गिरगिटों और अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए हैं।
उन्होंने मांग की है कि पुरातत्व अधिनियम 1958, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, वायु प्रदूषण अधिनियम 1981 और वन्यजीव अधिनियम 1972 के तहत दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
प्रशासनिक उदासीनता और भेदभाव के आरोप
77 वर्षीय पर्यावरणविद् ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन की जमा-पूंजी, खेती और प्रिंटिंग प्रेस तक पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में लगा दी, लेकिन प्रशासन उनकी जायज मांगों को अनसुना कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीकानेर में प्रशासनिक और जातिगत वर्चस्व के कारण रसूखदार लोगों के अवैध कब्जों और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई नहीं की जा रही है।
“प्रकृति ही वास्तविक भगवान है और इसके प्रकोप से कोई नहीं बच सकेगा। यदि शासन-प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना नहीं की और अतिक्रमण नहीं हटाए, तो हमें पुनः न्यायालय की शरण लेनी होगी।” — भगवानाराम प्रजापति ढाणी (भारती) संपादक- ‘खेजड़ा एक्सप्रेस’
उन्होंने सरकार से मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार शिक्षण संस्थानों और जनता के बीच शिविर लगाकर ध्वनि प्रदूषण और पटाखों के खतरों के प्रति जागरूकता फैलाई जाए।


