हज़रत इमाम हुसैन की स्मृति में 81वां ‘ऑल राजस्थान तरही मुशायरा’ संपन्न, शायरों ने पेश किया अकीदत का नजराना
हज़रत इमाम हुसैन की स्मृति में 81वां 'ऑल राजस्थान तरही मुशायरा' संपन्न, शायरों ने पेश किया अकीदत का नजराना



बीकानेर, 26 जून । कमेटी बज्मे मसालमा, बीकानेर के तत्वावधान में स्थानीय मोहल्ला भिश्तियान स्थित मदीना मस्जिद परिसर में हज़रत इमाम हुसैन (रजि.) और शहीदाने-कर्बला की याद में 81वें “ऑल राजस्थान तरही मुशायरे” का अकीदत और रूहानी माहौल में भव्य आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक मुशायरे में बीकानेर सहित चूरू, बिसाऊ (झुंझुनू) और प्रदेश के विभिन्न अंचलों से आए नामचीन शायरों ने बारगाहे-हुसैन में अपनी पुरअसर गज़लों और नज़्मों का नजराना पेश कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। इस वर्ष मुशायरे के लिए दिए गए विशेष मिसर-ए-तरह (थीम लाइन) “जिंदा रही नबी की शरियत हुसैन से” पर शायरों द्वारा पढ़े गए कलाम ने रातभर समां बांधे रखा।


मुशायरे की शुरुआत डॉ. जावेद आलम द्वारा कुरान-ए-पाक की मुकद्दस आयतों की तिलावत के साथ हुई। इसके बाद, चार घंटे से अधिक समय तक अनवरत चले इस दौर में शायरों ने कर्बला के ऐतिहासिक बलिदान और हक-इंसाफ की जंग को बेहद संजीदगी से बयां किया। कार्यक्रम के संयोजक और वरिष्ठ शायर जाकिर अदीब ने हज़रत इमाम हुसैन को वैश्विक लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों का सबसे बड़ा रक्षक बताते हुए पढ़ा:


“जम्हूरीयत पसंद, हमें क्यूं न हो पसंद / फ़ज़्ले-ख़ुदा से हम भी हैं बैअत हुसैन से”
संस्था के सचिव बुनियाद हुसैन “जहीन” ने इमाम आली मुकाम की बारगाह में अपना सलाम पेश करते हुए न्याय व्यवस्था पर एक बेहद उम्दा शेर पढ़ा:
“इंसाफ करने की जो जरूरी कभी पड़ी / ये हौसला भी लेगी अदालत हुसैन से”
गर्दिशों को ललकारा और बयां की कर्बला की अज़मत
विशिष्ट वक्ता और शायर डॉ. ज़िया उल हसन कादरी ने ज़माने की मुश्किलों को ललकारते हुए पढ़ा: “ऐ गर्दिशे-ज़माना जरा हट के बात कर / फरयाद कर रहा हूं मैं हज़रत हुसैन से”। वहीं, चूरू से विशेष रूप से आमंत्रित शायर इदरीस राज ने कर्बला की सरज़मीं की किस्मत का ज़िक्र करते हुए पढ़ा: “किस्मत पे नाज क्यों न करे दश्ते-कर्बला / इसको मिली है शोहरत ओ अजमत हुसैन से”। चूरू के ही अन्य शायर अब्दुल मन्नान मजहर ने इमाम हुसैन को जुल्म के खिलाफ एक शाश्वत उजाला बताते हुए पढ़ा: “उभरा इक आफताब वो कर्बो-बला में क्या / घबरा रही है आज भी जुल्मत हुसैन से”। बिसाऊ से आए शायर मखदूम ने अपनी मखमली तरन्नुम (लय) में कलाम सुनाकर पूरे माहौल को रूहानियत से सराबोर कर दिया, उन्होंने पढ़ा: “बांटेंगे जब नजात के मोती बरोज़े हश्र / खैरात हम भी पाएंगे हज़रत हुसैन से”।
मशहूर सूफी रचनाकारों ने दी मुशायरे को ऊंचाई
इस अदबी महफ़िल में राजस्थान उर्दू अकादमी, जयपुर के पूर्व सदस्य असद अली असद, साहिबे-दीवान शायर इमदाद उल्लाह बासित, अब्दुल जब्बार जज़्बी, अमर जुनूनी, मुहम्मद इसहाक गौरी ‘शफ़क़’, बरकात वारसी, सालिक इरम, महबूब देशनोकवी, गुलफाम हुसैन आही और मुहम्मद यासीन सहित कई लब्धप्रतिष्ठ रचनाकारों ने अपने बेहतरीन कलाम पेश किए। महफ़िल के अंतिम पड़ाव में मंगतू खान, उस्ताद हारून तथा पूर्व पार्षद सरताज हुसैन एंड पार्टी ने बेहद पुरकशिश अंदाज में विदाई का ‘सलाम’ पेश किया, जिसके साथ कार्यक्रम का गरिमापूर्ण समापन हुआ। पूरे मुशायरे का बेहद सफल और प्रभावी संचालन वरिष्ठ शायर ज़ाकिर अदीब ने किया।


