महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के परीक्षा भवन का नामकरण हुआ ‘गुरु जम्भेश्वर भवन’, 29 नियमों की पट्टिका का किया अनावरण
महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के परीक्षा भवन का नामकरण हुआ ‘गुरु जम्भेश्वर भवन


- गुरु जम्भेश्वरजी ने विश्व को जीने और प्रकृति संरक्षण की राह दिखाई : प्रो. मनोज दीक्षित
बीकानेर, 4 जुलाई । महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय (MGSU) में महापुरुषों के सम्मान एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की गई है. विश्वविद्यालय के मुख्य परीक्षा भवन का नामकरण आधिकारिक रूप से ‘गुरु जम्भेश्वर भवन’ किया गया है. इस गरिमामयी अवसर पर आयोजित विशेष समारोह में विश्वविद्यालय के कुलगुरु (कुलपति) प्रो. मनोज दीक्षित ने पर्यावरण आंदोलन के प्रणेता गुरु जम्भेश्वरजी के चित्र, उनके संक्षिप्त जीवन परिचय तथा उनके द्वारा प्रतिपादित जीवन के 29 महान नियमों की पट्टिका का विधि-विधान से अनावरण किया.


कार्यक्रम को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए कुलगुरु प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि गुरु जम्भेश्वरजी ने संपूर्ण विश्व को पर्यावरण संरक्षण, जीव दया और प्रकृति के साथ संतुलित सामंजस्य बिठाकर जीवन जीने की एक विलक्षण राह दिखाई है. आज के दौर में जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन का संकट गहरा रहा है, तब प्रकृति और उसमें निवास करने वाली असंख्य मूक प्रजातियों के संरक्षण के लिए गुरु जम्भेश्वरजी के सिद्धांत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं. उन्होंने बीकानेर के भौगोलिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि गुरु जम्भेश्वरजी का उपदेश स्थल, निर्वाण स्थल तथा पावन समाधि स्थल, ये तीनों ही बीकानेर जिले के अंतर्गत स्थित हैं, जो संपूर्ण बीकानेर संभाग के लिए परम गौरव का विषय है.


प्रो. दीक्षित ने पर्यावरण चेतना पर जोर देते हुए आगे कहा कि हमारे मरुस्थलीय प्रदेश में, जहां वर्षा एक मेहमान की तरह बेहद कम समय के लिए आती है, वहां हरियाली और वनों को बढ़ाने के लिए माता अमृतादेवी बिश्नोई तथा उनके साथ शहीद हुए 363 बिश्नोई बलिदानियों के ऐतिहासिक त्याग को सदैव स्मरण रखना होगा. उनकी पावन स्मृति में अधिकाधिक संख्या में पौधरोपण करना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी. उन्होंने जानकारी दी कि विश्वविद्यालय परिसर में ‘अमृतादेवी बिश्नोई उद्यान’ की स्थापना की जा चुकी है और भविष्य में विश्वविद्यालय स्तर पर गुरु जम्भेश्वरजी की कालजयी शिक्षाओं एवं उनके दर्शन पर उच्च स्तरीय शोध कार्यों (Research) को विशेष रूप से बढ़ावा दिया जाएगा.
जाम्भाणी साहित्य अकादमी के महासचिव विनोद जम्भदास ने इस ऐतिहासिक पहल का संपूर्ण श्रेय कुलगुरु प्रो. मनोज दीक्षित के प्रगतिशील विजन को देते हुए कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में इस प्रकार के नवाचार विद्यार्थियों को हमारी समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा, मूल संस्कृति तथा महान महापुरुषों के जीवन चरित्र से व्यावहारिक रूप से परिचित कराने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं. उन्होंने गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि आज विश्व के अनेक नामी विश्वविद्यालयों में गुरु जम्भेश्वरजी के सिद्धांतों पर व्यापक शोध कार्य हो रहे हैं और अब इस सूची में महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय का नाम भी अग्रणी संस्थानों में शुमार हो जाएगा.
समारोह में अकादमी के कोषाध्यक्ष डॉ. बी.एल. बिश्नोई ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान भौतिकवादी युग और एक-दूसरे से आगे निकलने की अंधी व आपाधापी भरी दौड़ में गुरु जम्भेश्वरजी के सिद्धांतों का अक्षरशः पालन अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि उनके विचार मानव जीवन को नैतिक, संतुलित और प्रकृति के अनुकूल बनाने की अचूक प्रेरणा देते हैं. वहीं राजस्थानी मोट्यार परिषद के श्री रामावतार शर्मा ने कहा कि गुरु जम्भेश्वरजी किसी एक विशेष समाज या पंथ के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के पथप्रदर्शक थे, जिनके द्वारा प्रतिपादित 29 नियम आज भी प्रत्येक व्यक्ति को सरल, अनुशासित और सदाचारपूर्ण जीवन जीने का मार्ग दिखाते हैं.
इस गौरवमयी अवसर पर जाम्भाणी साहित्य अकादमी की ओर से कुलगुरु प्रो. मनोज दीक्षित का साफा पहनाकर एवं लोई ओढ़ाकर भावभीना अभिनंदन व सम्मान किया गया. कार्यक्रम में राजकीय विधि महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. भगवानाराम बिश्नोई, डॉ. एल.सी. बिश्नोई, डॉ. रामेश्वरलाल बिश्नोई, जीवरक्षा अध्यक्ष मोखराम धारणियां, शिवराज खीचड़, हरिश्चंद्र लेघा, हरिराम खीचड़, दूलीचंद गोदारा, देवदत्त, सुभाष खीचड़, सुखराम भाम्भू, राजेश चौधरी, प्रशांत जैन, सुनील बिश्नोई, हरिराम गोदारा, मोहित बिश्नोई, योगेंद्र सिंह, नखतूचंद सहित जाम्भाणी साहित्य अकादमी व राजस्थानी मोट्यार परिषद के तमाम पदाधिकारी, सदस्य तथा बड़ी संख्या में शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित रहे।


