हर काल व परिस्थिति में धर्म-आराधना न छोड़ें- साध्वीश्री मुक्तांजनाश्रीजी
हर काल व परिस्थिति में धर्म-आराधना न छोड़ें- साध्वीश्री मुक्तांजनाश्रीजी


बीकानेर , 26 अगस्त। बीकानेर के रांगड़ी चौक स्थित सुगनजी महाराज के उपासरे में बुधवार को चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में साध्वी सुरंजनाश्रीजी म.सा. की शिष्या साध्वीश्री मुक्तांजनाश्रीजी ने धर्म-आराधना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि मनुष्य को किसी भी काल या परिस्थिति में धर्म-आराधना नहीं छोड़नी चाहिए, क्योंकि इसी से कर्मों का बंधन कटता है और पुण्यों का संचय होता है।


कर्म मनुष्य को भोगवाने में शर्म नहीं करते


साध्वीश्री ने अमीचंद व जिनमति के कथानक का दृष्टांत देते हुए बताया कि पूर्व जन्म में संचित अच्छे-बुरे कर्मों का फल हर जीव को भोगना ही पड़ता है। मन, वचन, शरीर की क्रियाओं और कषाय (काम, क्रोध, लोभ, मोह) के कारण कर्म बंधन होते हैं, जो व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कष्ट पहुंचाते हैं। उन्होंने प्रेरित किया कि कर्मों के प्रभाव से विचलित हुए बिना, समता भाव धारण कर देव, गुरु और धर्म की शरण में रहते हुए आराधना करनी चाहिए।
तपस्याओं का क्रम जारी, अगले माह बीस स्थानक पूजा
उल्लेखनीय है कि साध्वीश्री मुक्तांजनाश्रीजी पहली बार बीकानेर में चातुर्मास कर रही हैं। उनके साथ साध्वी सुरक्षाजनाश्री, सौम्यजनांश्री, चिलेहांजनाश्री व चितक्खरांजनाश्री के पावन सानिध्य में एकासना, बेला, तेला, अट्ठाई, आयम्बिल आदि तपस्याओं का क्रम अनवरत जारी है। आयोजकों ने बताया कि आगामी माह में बीस स्थानक पूजा का वृहद आयोजन भी किया जाएगा।
