जैन श्वेताम्बर संघ का पर्युषण पर्व से मंगलवार 8 सितम्बर से शुरू होकर 15 सितम्बर तक चलेगा

जैन श्वेताम्बर संघ का पर्युषण पर्व से मंगलवार 7 सितम्बर से शुरू होकर 15 सितम्बर तक चलेगा
STBA 5 JUNE 2026
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  • तेरापंथ भवन में प्रवचन व अखण्ड जाप
  • जिनालयों में होगी विशेष पूजा व अंगी, कन्हैयालाल भुगड़ी कर रहे रिकॉर्ड तपस्या

बीकानेर ,7 सितम्बर । जैन श्वेताम्बर तेरापंथ संघ, खरतरगच्छ, तपागच्छ, साधुमार्गी, शांत क्रांत का आध्यात्मिक पर्व ‘पर्युषण’ मंगलवार से शुरू होकर 15 सितम्बर तक चलेगा। वहीं, पार्श्वचंद्र गच्छ का पर्युषण पर्व बुधवार से शुरू होगा। इस दौरान जिनालयों में विशेष पूजा, अंगी रचना, जप, तप और स्वाध्याय के आयोजन होंगे।

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मंदिरों में विशेष रोशनी और अंगी रचना

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श्री चिंतामणि जैन मंदिर प्रन्यास के अध्यक्ष हरीश नाहटा के अनुसार भुजिया बाजार स्थित चिंतामणि जैन मंदिर, भांडाशाह मंदिर, रांगड़ी चौक स्थित भगवान महावीर व कुंथुनाथ स्वामी मंदिर तथा बच्छावतों के मोहल्ले के वासुपूज्य स्वामी मंदिर में विशेष सजावट की गई है।

नाहटा चौक स्थित 419 वर्ष प्राचीन भगवान आदिनाथ मंदिर में 8 से 14 सितम्बर तक विशेष अंगी रचना की जाएगी। प्रन्यास अध्यक्ष दौलत राम नाहटा ने बताया कि यह शहर की सबसे बड़ी प्रतिमा वाला जिनालय है, जहां वर्षों से अंगी सजाने की परंपरा निभाई जा रही है।

‘आज मेरे प्रभु घर आए’ अभियान

अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवा परिषद की ओर से 8 से 14 सितम्बर तक ‘आज मेरे प्रभु घर आए’ अभियान चलाया जाएगा। परिषद के अध्यक्ष अनिल सुराणा ने बताया कि आचार्य जिन मणिप्रभ सूरीश्वर जी व गुरुवर्या शशि प्रभा की प्रेरणा से युवा कार्यकर्ताओं की टीम (विक्रम भुगड़ी, कमल सेठिया, गौरव सावनसुखा, धवल नाहटा) असक्षम एवं वृद्ध श्रद्धालुओं के घर जाकर दोपहर 11:30 से 12:30 बजे के बीच प्रभु दर्शन व स्तवन करवाएगी।

कन्हैयालाल भुगड़ी की 64 दिन से निर्जला तपस्या

नाहटा मोहल्ले निवासी 65 वर्षीय कन्हैयालाल भुगड़ी इस वर्ष 64 दिन की तपस्या पूरी कर चुके हैं, जिसकी सोमवार को अनुमोदना की गई। भुगड़ी पूर्व में 2022 में 25 दिन, 2023 में 31 दिन, 2024 में 51 दिन और 2025 में 63 दिन की उग्र तपस्या कर चुके हैं। वे केवल उबले पानी का सेवन कर नियमित स्वाध्याय और जाप कर रहे हैं।

तेरापंथ जैन धर्मसंघ में पर्युषण पर्व 2026 में 8 से 16 सितंबर तक 9 दिवसीय साधना क्रम

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ में साधना, आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक चेतना का सर्वोत्कृष्ट पर्व ‘पर्युषण’ 8 सितंबर से 16 सितंबर 2026 तक श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाएगा। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ महासभा द्वारा प्रत्येक दिन को एक विशिष्ट साधना दिवस के रूप में निर्धारित किया गया है, ताकि श्रद्धालु प्रतिदिन एक-एक विशेष संयम पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

इस वर्ष योगक्षेम वर्ष अनेक जगह जहाँ साधु-साध्वी वृंद का प्रवास नहीं है , वहाँ बीकानेर सहित पुरे देश में विभिन्न क्षेत्रों में ‘उपासक श्रेणी’ के प्रशिक्षित उपासकों द्वारा यह आराधना संपन्न करवाई जाएगी। इसके अंतर्गत प्रतिदिन निश्चित लक्ष्य (जैसे—3 घंटे सामायिक, 9/11/13/15 द्रव्यों की सीमा आदि) तय कर श्रद्धालुओं को साधना करवाई जाएगी।

पर्युषण पर्व 2026 का दैनिक साधना क्रम (8 से 16 सितंबर)
दिन 1 — खाद्य संयम दिवस (8 सितंबर):
खान-पान की मर्यादा, क्या, कब और कितना खाना इसका विवेक रखना। इसके तहत द्रव्य सीमा, रात्रि भोजन त्याग, सचित्त त्याग और जमींकंद त्याग का संकल्प लिया जाता है। मान्यतानुसार जैन धर्म में वर्णित निर्जरा के 12 प्रकारों में से प्रथम 4 प्रकार सीधे खाद्य संयम से ही जुड़े हैं।

दिन 2 — स्वाध्याय दिवस (9 सितंबर):
आगम-शास्त्रों का पठन, श्रवण और आत्म-चिंतन। इस दिन प्रत्येक श्रद्धालु को कम से कम 1 घंटे के स्वाध्याय का लक्ष्य दिया जाता है।

दिन 3 — सामायिक दिवस (10 सितंबर):
48 मिनट तक राग-द्वेष से परे रहकर समभाव धारण करना और आत्मा में लीन होना। इस दिन श्रावक पुरे दिन भर में ज्यादा से ज्यादा सामायिक करते हैं।

दिन 4 — वाणी संयम दिवस (11 सितंबर):
असत्य, कटुवचन, चुगली और व्यर्थ बोलने से बचना तथा अधिक से अधिक मौन धारण करना।

दिन 5 — व्रत / अणुव्रत चेतना दिवस (12 सितंबर):
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के संकल्पों को ताज़ा करते हुए छोटे-छोटे व्रतों (अणुव्रत) को स्वीकार करना।

दिन 6 — जप दिवस (13 सितंबर):
नवकार महामंत्र का जाप और मंत्र साधना द्वारा मन को एकाग्र करना।

दिन 7 — ध्यान दिवस (14 सितंबर):
प्रेक्षाध्यान और कायोत्सर्ग (शरीर का उत्सर्ग कर ध्यान लगाना) के माध्यम से अंतर्यात्रा करना।

दिन 8 — संवत्सरी महापर्व (15 सितंबर):
पर्युषण का मुख्य दिन। इस दिन वर्षभर के पापों का आलोचन, प्रतिक्रमण, उपवास और पौषध व्रत रखकर उपवास की उग्र साधना की जाती है।

दिन 9 — खमत-खामणा / क्षमापना दिवस (16 सितंबर):
समस्त जीव-जगत से ‘मिच्छामि दुक्कडं’ के भाव के साथ क्षमा मांगना और सभी को मन से क्षमा करना।