विजयदान देथा के शताब्दी वर्ष पर डाक टिकट जारी करने की मांग- बीकानेर के साहित्यकारों ने केंद्र सरकार को लिखा पत्र

विजयदान देथा के शताब्दी वर्ष पर डाक टिकट जारी करने की मांग- बीकानेर के साहित्यकारों ने केंद्र सरकार को लिखा पत्र
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quicjZaps 15 sept 2025
  • पद्मश्री देथा की जन्म शताब्दी (1926-2026) पर राजस्थानी साहित्य को विश्व पटल पर पहचान दिलाने के लिए सम्मान की अपील

बीकानेर, 27 मई। राजस्थानी भाषा, साहित्य और लोक संस्कृति के शिखर पुरुष पद्मश्री विजयदान देथा ‘बिज्जी’ के जन्म शताब्दी वर्ष (1926-2026) के उपलक्ष्य में उन्हें विशेष सम्मान देने की मांग उठी है। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से पुरस्कृत राजस्थान के तीन वरिष्ठ साहित्यकारों—मालचंद तिवाड़ी, कमल रंगा और मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने साझा रूप से भारत सरकार से उनके नाम पर विशेष डाक टिकट जारी करने का पुरजोर अनुरोध किया है।

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विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर: ‘बातां री फुलवारी’
वरिष्ठ साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने देथा जी के योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि 2012 में उनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था, जो मरुधरा के साहित्य के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने बताया कि ‘बातां री फुलवारी’ के 14 भागों का सृजन कर देथा जी ने लोककथाओं को एक नया जीवन दिया। उनकी रचनाओं में मिट्टी की महक के साथ-साथ सामाजिक और मानवीय चेतना का अद्भुत संगम मिलता है।

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साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी ने उनके साथ बिताए संस्मरणों को साझा करते हुए कहा कि उन्हें बोरुंदा में देथा जी के सान्निध्य में ‘बातां री फुलवारी’ के 10 भागों का हिंदी अनुवाद करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह कृति केवल भारतीय भाषाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व साहित्य की एक अनमोल धरोहर है।

राजस्थानी भाषा के प्रति अनन्य निष्ठा
कमल रंगा ने बताया कि विजयदान देथा ने 1955 में संकल्प लिया था कि वे केवल अपनी मातृभाषा राजस्थानी में ही सृजन करेंगे और जीवन पर्यन्त इस संकल्प को निभाया। उन्होंने एक ऐतिहासिक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि साल 2004 में विज्ञान भवन में, साहित्य अकादेमी के इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री (तत्कालीन) द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित ‘महत्तर फैलोशिप’ प्रदान की गई थी।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत
तीनों साहित्यकारों ने संयुक्त रूप से कहा कि विजयदान देथा का शताब्दी वर्ष 1 सितंबर 2026 तक है। यह समय लोक साहित्य और राजस्थानी भाषा को अंतरराष्ट्रीय सम्मान देने का सबसे उचित अवसर है। भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी करना न केवल देथा जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी, बल्कि इससे नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और साहित्य से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी। यह करोड़ों राजस्थानी भाषियों की संस्कृति और अस्मिता का सम्मान होगा।

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