लोकतंत्र एवं उनकी संस्थाएं पुस्तक पर चर्चा
लोकतंत्र एवं उनकी संस्थाएं पुस्तक पर चर्चा


बीकानेर, 24 अगस्त। अजित फाउण्डेशन द्वारा आयोजित पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम के तहत आंद्रे बेते द्वारा कृत ‘‘लोकतंत्र एवं उसकी संस्थाएं’’ पुस्तक पर चर्चा आयोजित की गई। पुस्तक चर्चा के दौरान रामपुरिया विधि महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अनन्त किशोर जोशी ने पुस्तक के ‘‘कानून एवं प्रथा चैप्टर’’ पर अपनी बात रखते हुए कहा कि कानून, प्रथा एवं परम्पराएं समाज को संचालित करने के मुख्य आयाम है। भारत में जातिय एवं प्रथाओं के समाज में काफी विघटन आया एवं संविधान की स्थापना के साथ-साथ सामाजिक ताने-बाने में लोकतंत्र के प्रति समझ का विकास हुआ। डॉ. जोशी ने कहा कि समाज में जितना महत्व प्रथाओं का है उतना ही कानून का। जो प्रथाएं समाज के लिए स्वीकारीय हुई वह परम्पराओं के आधार पर निर्वहन हो रही है तथा जो प्रथाएं स्वीकारीय नहीं हुई उनको कुप्रथाओं का दर्जा देकर कानून के द्वारा हटा दिया गया।


इसी क्रम में सिस्टर निवेदिता गर्ल्स महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. रितेश व्यास ने पुस्तक के ‘‘सरकार एवं विपक्ष’’ चैप्टर पर अपनी बात रखते हुए कहा कि सरकार में विपक्ष का उतना ही महत्व होता है जितना सरकार में सत्तारूढ पार्टी का होता है। लोकतंत्र में दलहीन राजनीति का विषेष महत्व होता है जबकि काफी बार देखा गया है कि राजनितिक पार्टियों में दलगत विचारधारा हावी होने लगती है। डॉ. व्यास ने कहा कि एक सशक्त विपक्ष सरकार की नीतियों का सही आंकलन कर उसको मजबूती से क्रियान्वयन हेतु प्रयास कर सकती है।


कार्यक्रम में राजकीय डूंगर महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. नरेन्द्र नाथ ने पूरी पुस्तक पर बपनी बात रखते हुए कहा कि आंद्रे बेते द्वारा लिखि गई यह पुस्तक उनके आलेखों का संग्रह है जोकि अद्वितीय है। आंद्रे बेते लोकतंत्र एवं उनकी संस्थाओं पर लिखिते हुए कहते है समय-समय पर लोकतंत्र में बदलाव देखने को मिले है। लोकतंत्र में नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वह जागरूक नागरिक बने तथा लोकतंत्र में कुशल नेतृत्व के पक्षधर रहे।
डॉ. नाथ ने कहा कि आंद्रे बेते एक समाजशास्त्री थे लेकिन वह जन आन्दोलनों के ज्यादा पक्षधर नहीं रहे। उन्होंने संसद, न्यायपालिका, सिविल सेवा संस्थाएं, विश्वविद्यालय एवं मिडिया के बारे में बताते हुए कहा कि इन स्तम्भों पर ही हमारा लोकतंत्र टिका हुआ है, इसकी मजबूती के लिए हमें ईमानदारी से कार्य करना होगा। एक अच्छे लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष को होना बेहद आवश्यक बताया। विपक्ष के कारण ही सरकार की नीतियों का आलोचनात्मक विचार विमर्ष किया जा सकेगा। इसके लिए युवा पीढि का आगे आने होगा।
कार्यक्रम की अध्यक्ष्यता करते हुए इतिहास वेता प्रो. भंवर भादानी ने कहा कि वर्तमान में सत्तापक्ष में विपक्ष संवादहीनता होता दिखाई दे रहा हैं। विपक्ष के प्रश्नों पर सतापक्ष बात करने को तैयार नहीं है। प्रो. भादानी ने कहा कि आंद्रे बेते जैसे लेखकों की पुस्तक का अध्ययन करने से पहले हममें तार्किक सोच का होना चाहिए। पुस्तक में लोकतंत्र एवं लोकतंत्र को संचालित करने में सहायक संस्थाओं के बारे में खुलकर लिखा गया है जोकि हमारे लोकतंत्र को मजबूत करने में काफी सहायक रहेगा। उन्होंने सदन में कहा कि हम सभी को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए जिससे हमारी सोच एवं समझ का विकास होगा।
कार्यक्रम में समाज सेविका सुशिला ओझा ने कहा कि यह पुस्तक हमारे अन्दर कई जिज्ञासाएं उत्पन्न करती है जिसमें विशेषकर आज के राजनैतिक परिदृश्य को लेकर। हमें सामाजिक व्यवस्थाओं को बचाना होगा चाहें वह संयुक्त परिवार हो या अन्य ऐसे दूसरे विकल्प। प्रो. सुशिला ने कि इसके लिए मिडिया की भूमिका अहम मानी जाती है।
संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने बताया कि लोकतंत्र एवं उनकी संस्थाएं पुस्तक पर चर्चा करना एवं भावी पीढि को लोकतंत्र के विभिन्न पहलूओं से अवगत करवाना एक जागरूक नागरिक बनाने की ओर प्रथम प्रयास है। श्रीमाली ने कहा कि पुस्तक चर्चा हेतु आमंत्रित विद्वजन इतिहास, समाज, कानून एवं शिक्षा जैसे क्षेत्रों से आते है और इन चारो के विद्वानों द्वारा इस सदन में जो बात रखी गई है वह निश्चित रूप से सकारात्मक परिणामों को प्रदर्शित करेगी।
कार्यक्रम में डॉ. बृजरतन जोशी, डॉ. पंकज जोशी, आनन्द पुरोहित, हनीफ उस्ता सहित कई विद्वजनों ने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम में हनीफ उस्ता, डॉ. अजय जोशी, विपल्व व्यास, मो. फारूक, रामगोपाल व्यास, उषा बिस्सा, मनन श्रीमाली, आशीर्वाद हर्ष, दिनेश शर्मा, विनोद शर्मा, शिव दाधीच, विद्यासागर पंचारिया, महेश उपाध्यया, सैम्यूल हसन कादरी, हैदर उस्ता, दीक्षा व्यास, महावीर स्वामी सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में समाजसेवी महेश उपाध्यया ने संस्था की तरफ से सभी का आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया।
