कन्हैयालाल सेठिया की 107वीं जयंती पर साहित्यकारों ने किया स्मरण

कन्हैयालाल सेठिया की 107वीं जयंती पर साहित्यकारों ने किया स्मरण
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  • ‘धरती धोरां री’ ने राजस्थानी अस्मिता को दी नई पहचान

बीकानेर, 11 सितम्बर । राजस्थानी भाषा के विख्यात कवि एवं साहित्यकार कन्हैयालाल सेठिया की 107वीं जयंती के अवसर पर शुक्रवार को राजकीय सार्वजनिक मण्डल पुस्तकालय एवं सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर के संयुक्त तत्वावधान में एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान साहित्यकारों एवं प्रबुद्धजनों ने सेठिया के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनकी कालजयी साहित्यिक देन को नमन किया।

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राजस्थान की लोकचेतना और स्वाभिमान के सशक्त स्वर

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वरिष्ठ साहित्यकार व कथाकार व मुख्य अतिथि राजेन्द्र जोशी ने कहा कि कन्हैयालाल सेठिया केवल राजस्थानी के कवि नहीं थे, बल्कि वे राजस्थान की लोकचेतना, अस्मिता और स्वाभिमान के सशक्त प्रतिनिधि स्वर थे। उनकी ऐतिहासिक रचना ‘धरती धोरां री’ ने प्रदेश की माटी, संस्कृति और जीवन-दर्शन को वैश्विक पहचान दिलाई। यह कविता राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर की प्रतीक बन चुकी है।

विशिष्ट अतिथि राजाराम स्वर्णकार , साहित्यकार एवं गीतकार ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सेठिया की कृतियों में केवल मरुभूमि का सौंदर्य ही नहीं, बल्कि आमजन का संघर्ष, मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक चेतना समाहित हैं। उनकी प्रसिद्ध रचनाएं ‘पाथळ अर पीथळ’, ‘लीलटांस’ और ‘मींझर’ राजस्थानी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

साहित्यिक विरासत को सहेजने का संकल्प

अध्यक्षीय उद्बोधन में विमल शर्मा (पुस्तकालयाध्यक्ष) ने कहा कि कन्हैयालाल सेठिया ने अपनी अनुपम रचनाधर्मिता से राजस्थानी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मान-सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाई। उनकी इस समृद्ध साहित्यिक विरासत को सहेजना और नई पीढ़ी को इससे जोड़ना समाज का प्रमुख दायित्व है।

कार्यक्रम में नम्रता चौधरी, केशरी सिंह और प्रभु दयाल सहित अनेक साहित्यप्रेमियों ने विचार व्यक्त करते हुए कन्हैयालाल सेठिया के साहित्य को व्यापक रूप से पढ़ने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प दोहराया।

 

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