लक्ष्मीनारायण रंगा की 93वीं जयंती पर युवा पीढ़ी को निःशुल्क 100 से अधिक पुस्तकें विसर्जित की
लक्ष्मीनारायण रंगा की 93वीं जयंती पर युवा पीढ़ी को निःशुल्क 100 से अधिक पुस्तकें विसर्जित की

बीकानेर, 29 अक्टूबर। प्रज्ञालय संस्थान एवं श्रीमती कमला देवी-लक्ष्मीनारायण रंगा ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में कीर्तिशेष लक्ष्मीनारायण रंगा की 93वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय समारोह ‘‘सृजन सौरम – हमारे बाऊजी’’ का पहला दिन पूरी तरह पुस्तक संस्कृति, गौ सेवा और पौधारोपण को समर्पित रहा। लक्ष्मीनारायण रंगा सृजन-सदन में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम के दौरान कीर्तिशेष रंगा की विभिन्न विधाओं से जुड़ी 100 से अधिक पुस्तकें युवा पीढ़ी को निःशुल्क भेंट की गईं।


मोबाइल संस्कृति के दौर में पुस्तकें बांटना क्रांतिकारी कदम- कमल रंगा



कार्यक्रम में मुख्य सानिध्य प्रदान करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने कहा कि आज का युवा जब मोबाइल की दुनिया में उलझा हुआ है, ऐसे समय में उन्हें निःशुल्क पुस्तकें अर्पित करना एक क्रांतिकारी कदम है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण और गौ सेवा को इस समारोह से जोड़ना उनकी सर्व-समावेशी दृष्टि को दर्शाता है। बाऊजी मेरे लिए पिता से बढ़कर एक संस्था थे। वे अक्सर कहा करते थे— “लिखो ऐसा कि बीकानेर की धूल भी बोल उठे।” आज जब उनकी किताबें युवाओं के हाथों में सौंपी जा रही हैं, तो हम केवल पुस्तकें नहीं बल्कि बीकानेर की साहित्यिक आत्मा उन्हें सौंप रहे हैं। उनकी लेखनी ने सिखाया कि साहित्य केवल ड्राइंग रूम की शोभा नहीं, बल्कि समाज का संघर्ष है।
शिक्षा में संस्कार और संस्कृति जरूरी- राजेश रंगा
समारोह की अध्यक्षता करते हुए शिक्षाविद् राजेश रंगा ने कहा कि 93 वर्ष पहले जन्मे बीकानेर के एक सपूत कैसे पूरे देश के साहित्यिक ‘बाऊजी’ बन गए, यह शोध का विषय है। उनका मानना था कि शिक्षा तब तक अधूरी है जब तक उसमें संस्कार और संस्कृति का समावेश न हो। आज पुस्तकें बांटकर, पौधे लगाकर और गौ सेवा कर हम उसी जीवंत परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
चिंतन राष्ट्रीय और जड़ें बीकानेरी थीं-हरिनारायण आचार्य
विशिष्ट अतिथि हरिनारायण आचार्य ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि रंगा जी ने राजस्थानी और हिंदी साहित्य में विपुल सृजन किया है। अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद उल्लेखनीय रहा है। उनका वैचारिक चिंतन राष्ट्रीय था, परंतु उनकी जड़ें हमेशा बीकानेर की मिट्टी से जुड़ी रहीं।
समारोह के दौरान भवानी सिंह, शिव दाधीच, गिरिराज पारीक, अशोक शर्मा, कासिम बीकानेरी, राहुल, तोलाराम सारण, घनश्याम ओझा, किशन देराश्री, रामेश्वर सुथार, चम्पालाल और कन्हैयालाल सहित शहर के अनेक गणमान्य साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन युवा संस्कृतिकर्मी आशीष रंगा ने किया, जबकि आभार शिक्षाविद् महावीर स्वामी ने ज्ञापित किया।

