बीकानेर में डॉ. एल.पी. टैस्सीटोरी की 138वीं जयंती पर हुए कार्यक्रम

बीकानेर में डॉ. एल.पी. टैस्सीटोरी की 138वीं जयंती पर हुए कार्यक्रम
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डॉ. टैस्सीटोरी को सच्ची श्रृद्धांजलि राजस्थानी मान्यता मिलने पर होगी। -कमल रंगा
बीकानेर, 13 दिसंबर, 2025।
महान इतालवी विद्वान और राजस्थानी पुरोधा डॉ. लुईजि पिओ टैस्सीटोरी की 138वीं जयंती के अवसर पर बीकानेर में दो दिवसीय ‘सिरजण उछब’ का पहला दिन राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिए जाने की माँग पर केंद्रित रहा। करोड़ों लोगों की अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान हमारी मातृभाषा राजस्थानी को शीघ्र मान्यता एवं दूसरी राजभाषा का हक दिलाने के केंद्रीय भाव के साथ, प्रज्ञालय संस्थान एवं राजस्थानी युवा लेखक संघ द्वारा आयोजित इस उत्सव का आरंभ प्रातः टैस्सीटोरी समाधि स्थल पर पुष्पांजलि-शब्दालि से हुआ।

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डॉ. टैस्सीटोरी को पुष्पांजलि देते साहित्यकार

राजस्थानी को मान्यता देना ही सच्ची श्रद्धांजलि
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने अपनी शब्दांजलि देते हुए कहा कि हमें अपनी माँ, मातृभूमि और मातृभाषा के मान-सम्मान के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि राजस्थानी भाषा हजारों वर्षों पुराना साहित्यिक-सांस्कृतिक वैभवपूर्ण इतिहास रखती है और यह वैज्ञानिक दृष्टि से सभी मानदण्डों पर खरी उतरती है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार को शीघ्र ही इसे मान्यता देनी चाहिए। रंगा ने स्पष्ट किया कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता मिलना ही डॉ. टैस्सीटोरी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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अन्य वक्ताओं ने भी इस माँग का समर्थन किया। डॉ. फारूख चौहान ने राजस्थानी भाषा की अनदेखी को दुःखद पहलू बताया, जबकि जाकिर अदीब ने सरकारों से भाषा के प्रति संवेदनशील और सकारात्मक व्यवहार रखते हुए मान्यता पर शीघ्र निर्णय लेने की अपील की। मधुरिमा सिंह ने टैस्सीटोरी के कार्यों को जन-जन तक ले जाने के लिए कमल रंगा के प्रयासों की सराहना की। इस अवसर पर अनेक राजस्थानी हितैषियों ने श्रद्धा सुमन अर्पित कर टैस्सीटोरी को भाषा साहित्य, शोध और पुरातत्वविद् के रूप में नमन किया। कार्यक्रम का सफल संचालन गिरिराज पारीक ने किया।
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टैस्सीटोरी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि: “वेलि क्रिसन रुक्मणी री” का संपादन उल्लेखनीय

बीकानेर में डॉ. एल.पी. टैस्सीटोरी की 138वीं जयंती पर एक अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टिट्यूट के तत्वावधान में म्यूजियम परिसर स्थित उनकी प्रतिमा स्थल पर आयोजित किया गया। इसमें सैकड़ों शोधार्थियों और गणमान्य जनों ने प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी ने कहा कि अल्पायु में ही इटली से आकर टैस्सीटोरी ने राजस्थान में विशेषकर बीकानेर में रहकर यहाँ की भाषा को पढ़ना और लिखना सीखा। उन्होंने अथक परिश्रम, उत्साह और लगन के साथ चारणी साहित्य का अवलोकन किया और अनेक ग्रंथों का संपादन किया। जोशी ने टैस्सीटोरी के सबसे बेहतरीन कामों का उल्लेख करते हुए कहा कि “वेलि क्रिसन रुक्मणी री” और “छन्द राव जैतसी रो” नामक दो डिंगल भाषा के काव्यों को संपादित कर साहित्य जगत में प्रकाशित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है।

भारतीय शोध को दी नई दिशा
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डूंगर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. राजेन्द्र पुरोहित ने डॉ. टैस्सीटोरी के अकादमिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि टैस्सीटोरी ने तुलसी कृत रामचरितमानस और बाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन विषय पर फ्लोरेंस विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। डॉ. पुरोहित ने कहा कि उनके मौलिक शोध कार्य ने भारतीय शोधकर्ताओं को एक नई दशा-दिशा प्रदान की।

विशिष्ट अतिथि डॉ. सीताराम गोठवाल ने बताया कि टैस्सीटोरी का मुख्य लक्ष्य राजस्थानी के अलभ्य और अमूल्य ग्रंथों की खोज और सर्वेक्षण करना था, जिसके लिए उन्होंने जोधपुर और बीकानेर के पुस्तकालयों को अपना आधार बनाया। साहित्यकार राजाराम स्वर्णकार ने बताया कि टैस्सीटोरी ने “जूनी राजस्थानी” लिखकर राजस्थानी व्याकरण की आधारशिला रखी। विशिष्ट अतिथि एन.डी. रंगा ने राजस्थानी संस्कृति, विशेषकर लोक संस्कृति, के प्रति डॉ. टैस्सीटोरी के अगाध प्रेम को याद किया।

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