साधार्मिक भक्ति जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है’ – गणिवर्य मेहुल प्रभ

साधार्मिक भक्ति जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है' - गणिवर्य मेहुल प्रभ
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बीकानेर, 31 जुलाई। गच्छाधिपति आचार्य प्रवर श्री जिनमणि प्रभ सूरीश्वरजी के आज्ञानुवर्ती गणिवर्य श्री मेहुल प्रभ सागर ने गुरुवार को वर्षा के कारण डागा, सेठिया और पारख मोहल्ले के महावीर भवन में प्रवचन दिए। यदि सुबह साढ़े आठ बजे से साढ़े दस बजे तक वर्षा नहीं होती, तो नियमित प्रवचन ढढ्ढा कोटड़ी में होंगे।
धर्म का आधार और ‘साधार्मिक भक्ति’ का महत्व
श्री सुगनजी महाराज का उपासरा ट्रस्ट और अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवा परिषद की बीकानेर इकाई द्वारा सकल श्रीसंघ के सहयोग से आयोजित चातुर्मास में गणिवर्य मेहुलप्रभ सागर ने अपने प्रवचनों में कहा कि जिन शासन, देव, गुरु और परमात्मा भक्ति के साथ-साथ धार्मिक आचरण से ही धर्म टिका रहता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म को अपने जीवन और आचरण में उतारने का आह्वान किया। गणिवर्य ने बताया कि धर्म की परंपराओं को आगे ले जाने वाले असली सारथी साधार्मिक श्रावक-श्राविकाएं ही हैं। उन्होंने जप, तप, साधना, आराधना और प्रभु भक्ति को प्रोत्साहित करने, जिन शासन और धर्म-अध्यात्म की प्रभावना करने वालों का समर्थन करने, तथा साधार्मिक बंधुओं की निष्काम भाव से सेवा को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि साधार्मिक भक्ति, धार्मिक भक्ति से भी अधिक फलदायी होती है।

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साधार्मिक भक्ति’ की विस्तृत व्याख्या
गणिवर्य ने ‘साधार्मिक भक्ति’ की अवधारणा को विस्तार से समझाया, जिसे उन्होंने जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा बताया। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में साधार्मिक भक्ति को बहुत महत्व दिया गया है। साधार्मिक भक्ति का तात्पर्य है अपने साथी, समुदाय के लोगों की भक्ति और सेवा करना। यह केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उनके धर्म-अध्यात्म की क्रियाओं और साधना में मदद करना, तथा उन्हें मोक्ष के मार्ग के लिए प्रेरित करना भी शामिल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘साधार्मिक’ शब्द का अर्थ है ‘समान धर्म वाले’ या ‘साथी बंधुओं’ के प्रति भक्ति, यानि प्रेम, श्रद्धा और समर्पण रखना। उन्होंने आगाह किया कि साधार्मिक भक्ति में केवल भोजन करवाकर इतिश्री नहीं करनी चाहिए, बल्कि साधार्मिकों को आर्थिक, चिकित्सा सेवा और धार्मिक-आध्यात्मिक कार्यों में भी सहयोग करना चाहिए। गणिवर्य ने यह भी कहा कि अपने से कमजोर साधार्मिक को हीन भावना से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उनके प्रति दया और सहानुभूति रखनी चाहिए।

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